Kahanikacarvan

एक राज़ अनसुलझी पहेली – 68

रचित चुपचाप वार्ड से बाहर गलियारे से निकल रहा था| तभी वैभव जो आदर्श से सारी बात जानने के बाद से राजपरिवार के प्रति बहुत ही गुस्से में भर चुके थे, ऐसे समय एकदम से रचित को सामने देख वे उसपर बुरी तरह बिफरने से खुद को नही रोक पाए|

“तुम राजपरिवार वाले दूसरों को समझते क्या हो – हमने अपनी बेटियां ब्याही थी बेचीं नही कि तुम उनके साथ जैसा चाहे व्यवहार कर लो – इस परिवार में पहली पत्नी की मौत तय है इसलिए मेरी बेटियां ही मिली जिन्हें उस श्राप के लिए बलि चढ़ा दिया|” वैभव आपे से बाहर हुए बुरी तरह रचित पर बरस रहे थे कि आदर्श के रोकने पर भी रुके नही और मन की सारी भड़ास चुपचाप खड़े रचित पर निकालते  रहे जो अबतक इन सब बातों से अनजान था|

“वो तो भगवान् का लाख लाख शुक्र है कि मेरी एक बेटी उस घर में ब्याह से बच गई पर झलक को मैं इस तरह बलि नही चढ़ने दूंगा – सुन लो अच्छे से कान खोलकर – अब उस परिवार से हमारा किसी भी तरह का कोई नाता रिश्ता नही है और रही बात इस नाममात्र के वैवाहिक सम्बन्ध की तो जाके अपने कुंवर से कह देना जिसे अपनी ही पत्नी से कोई मतलब नही है वो चाहे जिए या मरे तो झलक को भी अब उससे कोई सरोकार नही रहा – हम झलक से डाइवोर्स पेपर साइन करा कर जल्दी ही भेज देंगे लेकिन इन सबके लिए मैं तुम सबको कभी माफ़ – नही क….रूँगा…|” चीखते चीखते वैभव को एकदम से खांसी आ जाती है जिससे उनके आखिरी शब्द लड़खड़ा जाते है| आदर्श वैभव को संभालता है तो तत्परता दिखाते रचित कुछ दूर रहे डिस्पेंसर से पानी लेकर तुरंत वैभव की ओर बढ़ाता है जिसे वह हिकारत से दूर धकेल देते है| आदर्श उस पल रचित का उतरा चेहरा देखता रह जाता है| यही पल था जब वैभव की आवाज सुन पलक, नीतू और अनामिका भी वही चले आए| अपने हाथ में पकड़ी बोतल अब वैभव की ओर बढ़ाती नीतू आगे बढ़कर पति को संभालती है| जिससे आदर्श जाते हुए रचित के पीछे भागता है| वह लगभग बाहर की ओर निकल ही गया था|

“रचित जी |”

आवाज सुन रचित अब पलटकर आदर्श की ओर अवाक् भाव से देखता है|

“मैं अपने फूफा जी ओर से आपसे माफ़ी मांगता हूँ – असल में गुस्से में अचानक आपको देखा तो वे आपे से बाहर हो गए जबकि मैं जानता हूँ आपने तो हमारी मदद ही की है |”

आदर्श जिस ग्लानि से अपने मन की कह रहा था उससे विरक्त रचित उस पल बेहद शांत रखते भरोसे का भाव दिखाता आदर्श के कंधे पर हाथ रखता हुआ कह रहा था – “मैं समझ सकता हूँ – अगर दो पल मुझे सुना लेने से उनका मन हल्का हुआ तो मुझे इससे कोई आपत्ति नही – आप उनका ध्यान रखिए |” अपनी बात खत्म करता हाथ जोड़ विदा लेता तुरंत ही रचित बाहर की ओर निकल जाता है|

रचित बेहद बुझे भाव से वापस महल की ओर चल दिया था| वहां की सुगबुगाहट से बाहर से ही पता चल गई कि इस बीच क्या क्या महल में गुजर गया लेकिन  उस पल का माहौल और रचित का मन दोनों ही बोझिल बने थे| वैसे भी पिछली दो रातों से रचित झलक की वजह से सोया नही था| गुजरी पूरी रात उसने एक इंजेक्शन ढूंढने में कहाँ कहाँ की ख़ाक छानी ये तो बस उसका मन ही जानता था| वह महल के होटल वाले हिस्से की ओर बढ़ रहा था| सभी कारिंदे उसे देख अभिवादन कर रहे थे पर अपने में ही खोया रचित किसी पर ध्यान ही नहीं दे पाया यहाँ तक कि सामने से आते अपने काका सा को भी नही देख पाया तो वे ही बढ़कर उसका कन्धा छूते उसे टोकते है|

“रचित – !”

“आँ !!” रचित चौंककर उनकी ओर देखता है|

“मालूम पड़ा तुम कल से हॉस्पिटल में थे – क्यों – तुम्हें इतना परेशान होने की क्या जरुरत थी – कितने सेवक तो वही भेज रखे है फिर तुम क्यों परेशान हुए ?”

वे अचरच भरी निगाह से रचित का चेहरा देखते उसे पढने का प्रयास करने लगे जहाँ बहुत कुछ अनकहा था| उसकी बोझिल नींद को तरसती निगाहे पत्थर सी हो आई थी मानों सदियों से नींद इनसे रूठी हो|

“तुमने अपनी क्या हालत बना रखी है जैसे पिछली रातों से तुम सोए भी न हो – ऐसा क्यों है रचित ?” वे अभी भी गौर से उसकी आँखों में देख रहे थे|

“काका सा एक इंजेक्शन लेने में जोधपुर जाने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया और उस वक़्त उनके परिवार का भी वहां कोई नही था और जब सब आ गए तो मैं चला आया |”

“पर तुम्हे इतना सब करने की क्या जरुरत थी – तुम किसी और को भी भेज सकते थे |”

इस पर रचित खामोश खड़ा रहा|

“क्या कुछ ऐसा है जो मैं समझ नही पा रहा क्योंकि किसी गैर के लिए मैंने तुम्हे इतना परेशान होता कभी नही देखा |” वे हैरान नज़रों से उसकी आँखों को ताकते हुए जैसे उसके मन तक उतरना चाहते थे पर जल्दी ही उनसे नज़रे हटाते रचित बेहद ख़ामोशी से उनके विपरीत चला जाता है|

हॉस्पिटल में अब वैभव को सभी सहज करते घेरे बैठे थे तभी अनिकेत जॉन के साथ वहां आता है| उसे देख वैभव का मन जैसे फिर से तरोताजा हो जाता है| वे उसे देख अपने गले से लगाने से खुद को नही रोक पाते| उस पल अनिकेत के प्रति उनके हाव भाव बेहद कृतज्ञ हो उठे थे|

“मैं इसे शब्दों में बयाँ नही कर सकता कि तुमने हमारे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया है – जब जब मैं पलक की ओर से उम्मीद खो बैठता हुआ तब तब तुम हमारे लिए आशा की किरण के रूप में आते हो -|” वे उसके दोनों बाजु पकड़े नम स्वर में कह रहे थे|

“ये आप क्या कह रहे है – मैंने आप पर कोई अहसान नही किया |” अनिकेत अपनी निर्मल मुस्कान से कहता है|

“कौन करता है किसी के लिए ऐसा – पता नही ये अहसान मैं कैसे उतार सकूँगा |”

वैभव की बात पर अनिकेत तुरंत प्रतिक्रिया देता है – “ये कोई अहसान नही ये तो मेरा फर्ज था |”

“फर्ज !!” वैभव की अवाक् नज़रे अवाक् अनिकेत पर टिक जाती है| तो बगल में खड़ी पलक की नज़रे लरज उठती है| लेकिन तभी वही आते आदर्श की आवाज उनके बीच बोल उठती है – “हाँ फूफा जी – जहाँ अधिकार होते है वही फर्ज जन्म लेते है |” कहता हुआ आदर्श अब उनके बीच आ चुका था और वे हैरान नजरो से उसे देख रहे थे – “हमसे गलती हुई तभी तो ऐसा हुआ – जिस अधिकार को जहाँ होना था वो हमने दिया ही नहीं इसलिए ईश्वर ने हमे अपनी गलती सुधारने का एक और मौका दिया है |” कहते हुए आदर्श की निगाह बाकी का सब उन्हें समझा गई जिसे समझते अचानक से वैभव के हाव भाव बदल गए जिससे वे तुरंत पलक की ओर देखते हुए पूछ उठे –

“क्या तुम अनिकेत को पसंद करती थी तो कहा क्यों नही मुझसे ?”

जवाब में पलक बस हौले से सर झुका लेती है तो आदर्श उसकी बात पूरी करता  फिर कह उठता है –

“गलती हमारी है जो हम पलक का मन नही पढ़ पाए – उदयपुर की उदासी, बेमन की तैयारी को हम अपनी अपनी समझ का जामा पहनाते रहे लेकिन उसे समझ नही सके |”

अब वैभव अनिकेत की ओर देखते उसका चेहरा पढने का प्रयास करते है जहाँ उसके हर सवाल का खुला उत्तर मौजूद था जिससे वे हर्षित होते अनिकेत का हाथ पकड़ते हुए कहते है – “गलती नही गुनाह हुआ है – जिस प्रेम ने मेरे जीवन को पूर्ण किया उसे मैं ही नही समझ पाया पर अब और देर नही करूँगा और जिसका अधिकार जहाँ है उसे उसी को सौंप दूंगा |” कहते हुए वैभव दूसरे हाथ से पलक का हाथ पकड़ते उन दोनों के हाथों को आपस में मिला देते है|

“आज सच में इतना खोने के बाद सब पा लेने की तृप्ति महसूस हो रही है –लखनऊ पहुँच कर सबसे पहले मैं पंडित जी से इस रिश्ते का निवेदन रखूँगा |”

उस पल उनके बंधे हाथ और वैभव के चेहरे का सुकून सबके चेहरों पर एकसार हो उठा| जॉन मुस्कराता अनिकेत के कंधे पर हाथ रखता है तो पलक शर्माती अब माँ से लिपट जाती है| इतने बोझिल समय में अब ये पल उन सबके लिए कुछ राहत भरा था| कुछ देर वही समय बिताने के बाद अनिकेत वापसी के लिए उठता है| जाने को उठते समय अनिकेत घूमती नज़र से एक बार पलक की ओर देखता चुपचाप मुस्करा देता है पर आदर्श उनकी छुपी नज़र पकड़ते पलक को पुकारता हुआ कहता है –

“पलक बाहर डिस्पेंसर से पानी ले आना |” कहते हुए वह एक बोतल उसकी ओर बढ़ाता है|

बोतल लेती पलक बोतल को हिलाती हुई आश्चर्य से पूछती है – “पर इसमें तो पानी है भईया |”

“हाँ है तो दूसरा ले आओ |” कहता हुआ आदर्श एक नजर अनिकेत और पलक की ओर साथ में देखता है जिससे पलक अपनी मुस्कान होंठो के भीतर छिपाए चुपचाप उठ जाती है| अब तक अनिकेत जॉन के साथ बाहर निकल चुका था| पलक ज्योंही बाहर निकलती गलियारे से मुड़कर जाने को होती है एकदम से अनिकेत उसकी नजरो के सामने आ जाता है जिससे वह चौंक जाती है| अनिकेत ठीक उसकी नजरो के सामने था और पलक की ओर झुका उसकी नजरो में झांक रहा था| उन्हें दो पल का एकांत देने जॉन कबका बाहर निकल चुका था| पलक अब धीरे से नयन उठाकर अनिकेत की आँखों में देखती है जहाँ प्रेम और विश्वास की अनंत लहरें उमड़ रही थी| आखिर यही तो उसका एकमात्र किनारा था जहाँ पहुंचकर वह अपना वजूद उसमे मिलता हुआ देखना चाहती थी| बस ये पल बहुत मुद्दत बाद उसकी झोली में गिरा था जिसे अब वह किसी भी कीमत में इसे गंवाना नही चाहती थी|

“कुछ कहना है !!” बहुत देर की खामोश पलक की नज़रो को टोहता हुआ अनिकेत मुस्कराया|

“कुछ पूछने कहने को रह ही नही गया बस यही मन कहता है कि ये पल अब मुझसे कभी दूर न जाए |”

पलक की बात पर उसी भाव से अनिकेत कहता है – “वादा है नही जाएगा – वैसे भी तुम तो मुझमें पहले से ही समाहित थी बस अहसास देर से हुआ जैसे शिव को अपनी सती का पर अब शिव से शक्ति कभी जुदा नही होगी – यकीन रखना |”

“यकीन है |” पलक की आँखों से उसी भरोसे पर अपना भरोसा रखती मुस्करा देती है|

झलक की हालत उसकी याद को छोड़ बाकि थोड़ी दुरुस्त दिखने लगी थी|जिससे अब सबके मन को काफी राहत हो गई थी| तभी डॉक्टर आकर उसे इंजेक्शन देते है इससे उन सबको रचित द्वारा इंजेक्शन लाने  की बात याद आती है और वे डॉक्टर से उस इंजेक्शन के बारे में पूछते है|

“डॉक्टर साहब जो इंजेक्शन आपको चाहिए था क्या मिल गया आपको ?”

“हाँ मिल गया और मैंने इनको दे भी दिया -|” डॉक्टर अब झलक की बांह पर रुई रखता हुआ उठने लगा तो नर्स आगे बढ़कर उस रुई को हौले हौले उसकी बांह में रगड़ने लगी|

डॉक्टर आगे कहते है – “बड़ी मुश्किल से मिलता है यहाँ |”

“फिर कैसे हुआ अरेंजमेंट ?” वैभव आश्चर्य से पूछते है|

“रचित साहब लाए जोधपुर से – वैसे काफी जल्दी ले आए – लगता है जोधपुर जाकर तुरंत ही लौट आए इसलिए समय से पहले ही आ गए – अब आपको चिंता करने की जरुरत नही है – काफी सुधार है झलक जी की हालात में |”

“आपका शुक्रिया डॉक्टर |” वैभव कृतज्ञता प्रकट करते कहते है|

डॉक्टर भी प्रतिक्रिया करते बाहर निकलने लगते है – “ये तो मेरा फर्ज था |”

डॉक्टर अब बाहर जा चुके थे| नीतू अब खुली आँखों से छत निहारती झलक का सर हौले हौले सहला रही थी तो वैभव सर झुकाए धीरे से कहते है – “आदर्श अब बहुत बुरा लग रहा है – उस पर भावावेश में आकर बेकार ही रचित को सब सुना दिया – आखिर इसमें उसकी क्या गलती – उसने तो बढ़ चढ़ कर हमारी मदद की और मैंने उल्टा उसे बुरा भला कह दिया|”

कहते हुए वैभव के चेहरे पर अफ़सोस जनक भाव दिखाई देने लगे जिसपर मरहम लगाते हुए आदर्श कहता है – “कोई बात नही फूफा जी उसने आपकी बात का बिलकुल बुरा नही माना – मैं बाहर तक उससे इसी बात की माफ़ी मांगने गया था पर उल्टा उसने कहा कि अगर मुझे सुनाकर आपका मन हलक हुआ तो इसका उसे कोई गिला नही – |”

“ओह क्या सच में उसने ये कहा !”

“हाँ फूफा जी – वह काफी सुलझा हुआ इन्सान है और समझदार भी|” आदर्श इसमें अपनी सहमति देता एक गहरा उच्छ्वास छोड़ते हुए कहता है|

“फिर उन स्वार्थी लोगो के बीच वह क्या कर रहा है ?”

वैभव के प्रश्न पर सभी मूक होते बस एकदूसरे को देखने रहते है|

प्रश्न बहुत है पर सब अब सुलझते जाएँगे…

……क्रमश ….

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