Kahanikacarvan

एक राज़  अनुगामी कथा  – 26

अब वे रिक्शे में बैठी अनिकेत से दूर हो चली थी| झलक अब एक बार पलटकर पीछे देखकर पलक की ओर देखती हुई कह रही थी –

“ये पंडित जी कुछ ज्यादा ही कृपालु नही हो रहे तुमपर – कही तेरे सपने में उतरते उतरते तेरे दिल में उतरने का प्रोग्राम तो नही इनका|” कहती झलक आंख मटकाती कंधे से उसे हौले से धक्का देती है जिससे पलक मुंह सिकोड़ती हुई कहती है –

“कुछ भी सोच लेती है – तेरे दिमाग में बस फालतू के कीड़े ही कुलबुलाते रहते है – वो एक अच्छे इंसान है और मेरी हेल्प कर रहे है और कुछ नही समझी |”

“हाँ वो तो दिख ही रहा है हेल्प करने को कितने बेचैन हुए जा रहे है वैसे पंडित जी है बड़े हैन्डसम – अपन भी चांस मार सकते है |”

कहकर वह शरारत से हँस दी|

“सीरियसली झल्लो मुझे हेल्प की वाकई जरुरत है – मैं अपने सपनों से परेशान हो चुकी हूँ |”

रिक्शा अब उसके घर के पास पहुँचने ही वाला था और दोनों अभी भी उसी उधेड़बुन में थी|

“मैं इतनी परेशान हूँ कि अब अपने सपनों को जानने के लिए कुछ भी रिस्क ले सकती हूँ |”

“पागल है क्या – तुमने सुना नही वो झबरीला भालू क्या बोला – ये खतरनाक भी हो सकता है – और फिर एक सपना ही तो है – कुछ दिन बाद अपने आप चला जाएगा – समझी |”

दोनों बात करते करते अब घर आ गई थी| लेकिन बात उनके दिमाग में अभी भी घपच मचाए थी जिससे दोनों अब खुसर पुसर करती बात कर रही थी| तबसे उन्हें ऐसे खुसर पुसर करते देख माँ उनको झिड़कती हुई बोली –

“ये तब से क्या तुम लोगों का फुसफुसाना चल रहा है – झलक कोई नई शैतानी की प्लानिंग चल रही है क्या तुम्हारी ?”

माँ की घूरती ऑंखें अब उन दोनों पर टिकी थी जिससे पलक घबरा कर बस बोलने ही वाली थी कि झलक उसका हाथ दबाती बीच में ही बोल पड़ी – “अरे हाँ माँ – तब से हम एक प्लान ही तो डिस्कस कर रहे है|”

झलक की बात सुन पलक परेशान आँखों से उनकी ओर देखने लगी लेकिन इसके विपरीत झलक पूरी रोचकता से अपनी बात कहने लगी – “पूरा दिन तो बोर होती है हम – अब कितना टीवी देखे और कितना सोए तो हमने मिलकर डिसाइड किया है कि खाली समय बर्बाद नही करना तो वो मेरी फ्रेंड इति है न उसकी दीदी क्या क्लासिकल डांस करती है बस उन्ही के पास पहुँच जाते है उसने साथ डांस की प्रैक्टिस भी हो जाती है और टाइम भी अच्छे से पास हो जाता है – हैं न पलक !”

सहमति के लिए झलक अब पलक की ओर देखती है तो वह बड़ी मुश्किल से हाँ में सर हिला पाती है|

“हाँ हाँ ठीक है पर कभी कभी किताबे भी उठाकर देख लिया करो – कॉलेज बंद हुआ है पढाई खत्म नही हुई – चलो अब जल्दी से किचेन सेट कराओ फिर करती रहना अपनी खुसुर पुसुर |”

माँ टेबल के कुछ बर्तन उठाती बाकी के बचे बर्तन उन्हें उठाने का निर्देश देती चली जाती है| उनके आते पलक एक गहरा उच्छवास छोड़ती झलक के कानों के पास आती बोलती है – “तू भी न कितना कांफिडेंस से झूठ बोलती है – एक बार को तेरी बात पर मुझे भी यकीन हो गया – सच में झूठ बोलने में तू न झूठी की रेखा से भी चार कदम आगे है|”

“हाँ तो आगे ही रहना चाहिए पीछे थोड़े न |”

उसकी हँसी पर उसकी चिकोटी काटती पलक बोलती है – “तुझे झूठ बोलकर क्या मिलता है – माँ को सच भी तो बता सकते थे |”

“तो जा बता दे सच |”

“अब क्या तू जो झूठ का रायता फैला चुकी है अब उसी को समेटना पड़ेगा |”

“लो भलाई का तो जमाना ही नही – एक तो मम्मी को डांट से बचाया ऊपर से मैडम का उपदेश सुनो – मैं तो चली सोने – अब तू जाने और तेरा काम|”

“और ये बर्तन कौन उठाएगा |”

“जिसने सुना वो – मैंने तो कुछ सुना ही नहीं |” खीसे फैलाती झलक उछलकर चल देती है पीछे पलक मुंह खोले देखती रह जाती है|

पलक बहुत देर खुद को समझाती रही कि आखिर सपनो को जानने में कितना खतरा हो सकता है कम से कम रोज रोज की उलझन से छुटकारा तो मिलेगा| इसी उधेड़बुन में घिरी पलक सो जाती है| रात देर से नींद आने से पलक सुबह देर तक सोती रही और छुट्टी का दिन होने से किसी ने उसे जगाया भी नही|  झलक सुबह उठकर बरामदे तक जाती है जहाँ आती सुबह की हलकी धूप में उसके मम्मी पापा सुबह की चाय पी रहे होते है| झलक वहां पहुंची ही थी कि तेज और परेशान आवाजो को सुन वह दरवाजे पर ही ठिठक जाती है| वे आपस में बात करते परेशान से थे, झलक दरवाजे की ओट से उनकी आवाज सुन मामला समझने लगती है| वे आदर्श को लेकर परेशान होते है, वह शायद हयात होटल की उदयपुर वाली ब्रांच में जाने वाला था जो घर से कोई भी नही चाहता था| इससे उससे मिल नहीं पाएँगे क्योंकि राजस्थान कोई नही जाना चाहता था पर आदर्श वही जाना चाहता था साथ ही उसका उदयपुर की साथ में काम करने वाली लड़की के साथ सेटिंग का डर भी था इसलिए नीतू वैभव को मना रही थी कि इस वक़्त भैया भाभी परेशान और आदर्श से नाराज होने से उससे बात भी नही कर रहे तो इस वक़्त उन्ही को उसे समझाने लखनऊ जाना चाहिए इससे पहले कि वह उदयपुर जाने का अपना मन पक्का कर ले| आखिर वे दोनों ही साथ में जाने का डिसाइड करते झलक को आवाज ही लगाते है तो झलक जानकर अनजान बनती अंगड़ाई लेती वहां आती है|

“क्या हुआ मम्मी !” जानकर उबासी लेती वही कुर्सी पर उकडू बैठ जाती है|

“पलक अभी नहीं उठी -|”

“नही – क्या उठा दूँ उसको ?”

“नही छोड़ दे सोने दो – ऐसा करो झलक हमे किसी काम से अभी लखनऊ के लिए निकलना है हम जल्दी से काम निपटा कर शाम से पहले ही आ जाएँगे और तब तक तुम दोनों घर में ही रहना – इधर उधर कतई मत जाना समझी न और ये खासकर तुम्हारे लिए कह रही हूँ|”

“ओके मम्मी आप आराम से जाओ और आराम से आओ – मुझे आज कही नही जाना – समझ गई |”

माँ जानती थी झलक के बचपने को पर उसकी मुस्कान पर हौले से उसके चपत लगाती “हाँ याद रखना |” कहती झट से अन्दर की ओर चल देती है|

उनके जाते झलक झट से चिप्स का पैकेट लिए सोफे पर लेटी लेटी टीवी पर मूवी देखने लगती है अब न कोई नहाने को बोलने वाला था और न उठकर बैठने को कहने वाला, उसका तो आज सारा दिन सुस्त की तरह पड़े रहने का प्रोग्राम था| इधर पलक उठते माँ पापा के जाने का सुनकर रसोई में कुछ बनाने चल दी| अब वो भी नास्ता कर उसके पास आकर बैठ जाती है| तभी दरवाजे की कॉल बेल से वह दरवाजा खोलने जाती है| पलक देखती है कि दरवाजे के पार अनिकेत होता है|

“नमस्ते वो मैं पिताजी के कहने पर आपके पापा से मिलने आया था – कुछ सन्देश था अगली पूजा के लिए – वैसे आप कैसी है ?”

“ठीक हूँ और पापा घर पर नहीं है |” संकुचाती हुई पलक धीरे से कहती है क्योंकि न वह उसे अपरिचित की तरह जाने को ही कह सकती थी और न परिचित की तरह अन्दर ही बुला सकती है|

“ओह कोई बात नही – मैं फिर आता हूँ – आप अपना ख्याल रखिएगा |” तुरंत पलटकर अनिकेत वापस चला जाता है पलक कुछ पल वही खड़ी देखती रह जाती है जब तक पीछे से आकर झलक उसे टोक नही देती |

“कौन था पल्लो ?”

“पंडित जी |” कहकर अबकी पलक शरारत से हँस दी|

“चले गए !”

“हाँ जब बताया पापा नही है तो एक पल भी नही रुके – बहुत जेंटल व्यक्ति है |” पलक अभी भी बाहर की ओर देखती कह रही थी| झलक उबती हुई वापस जाती कहती रही –

“चलो अच्छा हुआ नही तो चाय बनाना पड़ता – पलक कुछ बनाओ न मुझे भूख लगी है |”

“मैं नही बना रही अभी तो ब्रेकफास्ट बनाया था अब तुम्हारी बारी |”

पलक गुस्से में मुंह बनाती कह रही थी|

“मैं – मैं क्या बनाउंगी ?”

“कुछ भी जो फटाफट बन जाए ऐसा कर झल्लो तू न खिचड़ी बना दे |”

“खिचड़ी – अब कौन दाल चावल निकाले – कुछ और बता |”

“उपमा, पोहा !”

“आलू काटने पड़ेंगे|”

“तो भेलपूड़ी ही बना दे |”

“अब मूंगफली तलना पड़ेगा |”

झलक की मक्कारी से अब पलक का पारा चढ़ गया जिससे कमर पर हाथ धरती वह उसको घूरती हुई बोलती है – “आलसी कही की – अब मैं बनाने जा रही हूँ और तुझे ठेंगा दूंगी -|”

“मेरी प्यारी पलक बहना सुन न – थोडा सा दे देना – भगवान तुम्हारा भला करेंगे बहना |”

पलक को झलक की बात पर हँसी आ रही थी पर किसी तरह से अपनी हँसी होंठो के बीच छुपाती वह रसोई की तरफ मुड़ जाती है|

दोनों खाना खाकर साथ में लेती छत की ओर घूरती बीते दिन की बात फिर सिलसिलेवार सोच रही थी और हर बार सारा राज राजस्थान पर आकर खत्म होता दिखता| इससे एकदम से चिहुंकती हुई झलक बोली – “पल्लो तुझे नहीं लगता कि सच में राजस्थान को लेकर कोई राज़ है जिसे पापा हमसे छुपा रहे है |”

पलक अब चौंककर उसकी ओर देखती है|

“कुछ तो है क्योंकि हर एक बात यही संकेत कर रही है – चल |”

एकदम से उसे उठकर बैठा देख पलक भी चौंक जाती है|

“कहाँ ?”

“पापा की लाइब्रेरी – पापा अपना ज्यादातर समय वही बिताते है – वही खोजते है कुछ तो राज होगा |”

“नही – पागल है क्या और पापा को जरा भी भनक लग गई तो !!”

“अरे मेरी बुद्धू बहन पापा कोई जादूगर है क्या जो बिना देखे सब जान जाएँगे – हम चुपचाप बिना कोई सामान डिस्टर्ब किए अपनी खोज बीन करते है|” झलक कहती  हुई बस जाने को तैयार थी पर पलक का मन ऐसा करने से डर गया था| फिर भी झलक उसे अपने साथ खींचती हुई लाइब्रेरी आ जाती है|

वो कमरा ऐसा था जहाँ कोई भी नही जाता था क्योंकि किताबो से घिरा कमरा सबके लिए कोई ख़ास आकर्षण नही लगता था और फिर पापा अपना खाली वक़्त वही बिताते थे| झलक के कहने पर पलक भी अब उसके साथ आती उस कमरे में अपनी खोजबीन करने लगी| वे दोनों बारी बारी से किताबो की रेक देखती तो साथ ही अलमारी खंगाल डालती पर देर तक की अपनी खोजबीन के बाद भी उसको राज जैसा कुछ नही मिला फिर से वे रेक के आस पास देखने लगी जहाँ एक दीवाल के कोने में कोई तस्वीर मिली जिसे गौर से देखती हुई झलक पलक से बोल रही थी –

“ये तो बड़े पापा और बड़ी मम्मी की तस्वीर है न – लगता है उसकी शादी के बाद की है – मम्मी ने बताया था न कि उनकी एक्सीडेंटल डेथ हो गई थी|”

पलक अब उस तस्वीर को गौर से देखती जैसे उसी में खो गई तो झलक हँसती हुई कह रही थी – “बड़ी मम्मी की तस्वीर देखो – कभी लगता है जैसे उनका फेस तुमसे मिलता है – लगता है न !!”

पलक गुम हो गई थी जिससे न उसका न हाँ निकला न न, अब उबती हुई झलक उससे कह रही थी – “यार इतना काम करते मुझे तो नींद आने लगी – मैं तो चली सोने |”

झलक बिना रुके जल्दी से बाहर निकल गई जबकि पलक वही सोचती खड़ी रह गई| उसे लगा जैसे कुछ तो इस कमरे में होगा जो उसे मिल जाएगा| पलक फिर से अपनी खोज शुरू करती है, इसी खोजबीन में उसका ध्यान अचानक दो रेक के बीच में खाली स्थान पर जाता है और सच में वहां उसे कुछ दिखता है| वह हाथ डाल उस चीज को अपनी ओर खींच लेती है| वह कोई डायरी थी| जिसकी धूल झाड़ती वह उसे लिए वही बैठ जाती है|

क्रमशः…………………..

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