Kahanikacarvan

एक राज़  अनुगामी कथा – 8

नज़रे नीची किए झलक मन ही मन बडबडा रही थी ‘जिसे न देखना चाहो वही सामने आ जाती है|’ पलक डरी सी हौले हौले कांपने लगी थी|

“सो टेल मी वेअर आर यू कमिंग फ्रॉम ?” मेट्रन मैम की घूरती हुई आँखे अब उन्ही पर टिकी थी –“बोलो जल्दी – चुप क्यों हो ?”

एक दम से वे चीखी तो पलक डरकर झलक का हाथ पकड़ लेती है, झलक अभी भी नज़रे नीची किए खड़ी थी और उनकी डरी हालत पर शर्मीला और तानिया के चेहरे पर शैतानी मुस्कान फ़ैल गई थी|

उनकी आवाज सुन अब एक अन्य जोड़ी कदम भी वही चले आ रहे थे, बस यही कमी रह गई थी, धीरे से नज़र उठाकर उन कदमो के चलने के तरीके से वह सुनिश्चित हो गई कि अब हेड मैम भी वही आ रही थी| सर मुंडाते ओले पड़ने वाली कहावत आज बड़ी जोर से याद आ रही थी झलक को|

“यहाँ क्या हो रहा है और ये पलक झलक ऐसे क्यों खड़ी है ?” हेड मैम भी आती अब उनको शंकित भाव से घूरने लगी|

कि तभी झलक ने रोना शुरू कर दिया, सब जबतक कुछ प्रतिक्रिया करते वो जोर जोर से आवाज करती हुई रोने लगी| सारे अवाक् झलक को देखते रहे जो पलक का हाथ झटके से छोड़कर उसकी तरफ घूमती हुई उसपर तल्ख़ भरे लहजे से कह रही थी –

“बताओ अब क्या जवाब दूँ – हर बात मान लेती है मेरी अब भुगतो – मुझे मना नहीं कर सकती थी |” सुबकने की आवाज निकालती हुई झलक कह रही थी और उसकी ये बात सुनते पलक की साँस जैसे हलक में अटकी रह गई, लगा चक्कर खाकर गिर जाएगी, आखिर ये झलक को हुआ क्या है ?? क्या अपना बचकर आज उसकी बलि दी जानी उसने तय कर लिया !! कुछ मोटे मोटे आंसू पलक की पलकों पर भी घुमड़ आए थे|

“कुछ भी करती हूँ तो सबमे मेरा साथ देती है अब भुगतो |”

झलक की बात सुन बाकी सभी की ऑंखें भी अब उसी पर टिकी थी, शर्मीला तो अपना कान खुजाती तानिया की फैली हुई आँखों की ओर देखने लगी|

“बात क्या है – ये सब क्या नाटक लगा रहा है – पलक तुम बताओ कि बात क्या है ?” मेट्रन मैम की चील सी ऑंखें जैसे ही पलक की ओर गई वो बेतहाशा अन्दर तक हिल गई|

“मैम मैं बताती हूँ – इसकी तो बस यही गलती रहती है कि हमेशा अच्छी बहन की तरह ये मेरा साथ दे देती है |” हलके से रूक रुककर अपनी बात कहने अब झलक मेट्रन मैम की ओर मुड़ जाती है|

सब अचरच भरी नज़रो से झलक को देखने लगे|

“मैम हम सुबह सही समय पर लखनऊ आ गई थी फिर आराम से ऑटो पकड़ बस यहाँ आने ही वाली थी कि…|” जानकर कुछ पल का पॉज़ देती तब से कंधे में टंगे बैग को नीचे रखती हुई गला साफ़ करती अपना किस्सा शुरू करने लगी – “एक दादी जी आई और हमे एक कागज दिखाती हुई कहने लगी..|”

“क्या कहने लगी…?” असब्र मन से मेट्रन मैम पूछ बैठी इससे आस पास की सभी की ऑंखें झट से उनकी ओर उठ गई तो अपने चेहरे पर जबरन और गुस्सा भरती हुई फिर से झलक को घूरने लगी|

झलक भी अपना मुंह तिकोना बनाती कह उठी – “उस कागज में उनके बेटे का मोबाईल नंबर लिखा था – वे बेचारी अकेली बनारस से सीधी चली आ रही थी – उनके बेटे ने कहा था कि बस के लखनऊ पहुँचते वे कहीं से उन्हें इस नंबर पर फोन कर देगी तो वो उन्हें लेने आ जाएगा |”

कहकर फिर कुछ पल का पॉज़ देती झलक बारी बारी से सबका चेहरा देखने लगती है जहाँ “फिर क्या हुआ” पूछती हुई ऑंखें उसकी ओर उठी हुई थी|

“पहले तो मन किया कि मुझे क्या करना दादी जी को हाथ जोड़ मना कर देती हूँ लेकिन लगा बस एक कॉल ही तो करनी है – अब हॉस्टल के नियमानुसार हमारे पास मोबाईल तो था नही इसलिए पास की दूकान में जाकर एक भैयाजी जी से प्रार्थना की – |” झलक किसी किस्सागोई की तरह गंभीरता से कहती जा रही थी और सब ख़ामोशी से उसे सुन रहे थे|

“एक बार पूरी रिंग जाकर कट गई – सोचा उनका बेटा कही बिजी होगा – फिर कुछ पल रूककर दुबारा मिलाया फिर फोन नही उठा – फिर तिवारा – फिर बार बार कई बार मिलाती रही – पूरे सौ बार मिलाया पर फोन न उठा तो न उठा|” सब अभी भी मौन उसका चेहरा ताक रहे थे इससे झलक कहती रही – “मन तो किया दादी जी को बोल दे कि अब मैं आपके लिए कुछ नही कर सकती – आखिर हॉस्टल पहुंचना था हमे समय पर |”

कहकर झलक एक क्षण को हेड मैम के चेहरे पर आए संवेदना भरे भाव को पढ़ती हुई झट से फिर बोल पड़ी, आखिर अपना पकाया खाना पूरी तरह से पकने से पहले आंच से उतारना नही चाहती थी|

“मन तो किया कि दादी की बूढी लाचार काया पर तरस खाने के बजाये हॉस्टल के नियम याद रखूं पर उसी वक़्त आपका चेहरा ख्याल में आ गया – सुबह सुबह जो प्रार्थना आप हम सबके लिए चलाती है वो अचानक से मेरे मन में किसी फिल्म की तरह चलने लगी|” झलक बड़े नाटकीयता से अपने भावों में बहुत सारा भोलापन लाती हुई उनके सामने हाथ जोड़ती हुई प्रार्थना गुनगुनाने लगती है| हॉस्टल की सभी लड़कियां ही जानती थी कि सुबह सुबह जो प्रार्थना चलाकर हेड मैम जिस तरह का अत्याचार करती थी कि जबरन उन्हें अपनी अपनी सपनीली प्यारी नीद तोड़कर बाहर आना पड़ता था| पर आज तारीफ सुन हैड मैम की मुस्कान इंच भर हो गई थी|

“मैम मैं क्या करती – एक तरफ हॉस्टल के नियम थे दूसरी तरफ इंसानियत – आखिर मैंने नियम तोड़े |” आखिरी शब्द थोडा तेज स्वर में झलक बोली तो पलक का दिल सच में धक् से बोलकर रह गया|

“हम उनके बताए पते पर केसरबाग से अलीगंज तक गए – सोचा दादी जी को आराम से छोड़कर वापस आ जाएंगी पर होनी तो कुछ और लिखी थी|” बेबस सा मुंह बनाती वह कहती रही|

“क्या मतलब – क्या बेटे ने पहचानने से इंकार कर दिया ?” हैड मैम घबराकर पूछ बैठी|

बाकी सब भी औचक झलक की ओर देख रहे थे|

“नहीं मैम – वहां जाकर पता चला कि उनका बेटा अमीनाबाद के लिए निकल गया वहां गड़बड़झाला में उसकी दुकान है – तभी मैंने पलक से कहा कि तू चली जा मैं दादी जी को अकेला नहीं छोड़ सकती पर इसने कहा मानी मेरी बात |” झलक भोला सा चेहरा बनाती हुई पलक की ओर एक नज़र डालती है जो ऑंखें फाड़े बुत बनी उसकी कहानी सुन रही थी फिर बाकी की ओर दयनीय मुद्रा में देखती हुई आगे कहने लगी – “हम दोनों दादी जी को लिए अब अमीनाबाद के लिए निकली – ऑटो बस करते करते किसी तरह से गड़बड़झाला की गली में कितनी मुश्किल से उनकी दुकान ढूंढ कर दादी जी को बस वहां छोड़कर तुरंत ही हॉस्टल के लिए निकल आई तभी तो आते आते हमारी ये हालत हो गई – रूककर कही कुछ खाया पिया भी नहीं ..|” फिर से सुबकने की आवाज निकालती हुई झलक कहती हुई अपनी सूखी आँखों को पोछती हुई चुपके से हेड मैम और मैट्रेन मैम के चेहरे के बदलते हुए भावों की ओर देखती हुई नाक की हवा खींचती है|

“ओहो बेचारी कितना परेशान हो गई |”

हेड मैम के इसी स्वर का इंतजार था, झलक का मन बलियों उछल पड़ा पर दिखाने को मुंह वैसा ही लटकाए रही|

लेकिन तानिया और शर्मीला की ऑंखें अंगार हो उठी, वे हाथ मलती बेबस सी देखती रही|

“मैम ये तो बच्चियों ने बड़ा पुण्य का काम किया – देखा मैं न कहती थी कि सुबह सुबह की प्रार्थना मन में अपना असर जरुर छोड़ेगी – |”

झलक आँखों में मासूमियत लाती हाँ में सर हिलाती अब उन्ही की ओर देख रही थी और पलक उसकी तो आवाज हलक में अटकी रह गई| मन ही मन सोचती रह गई कि झलक तो चलती फिरती झूठ की मशीन है, कैसे पल में कहानी पलट दी…

“जाओ बच्चों – आराम करो – अगर कॉलेज जाना जरुरी नहीं है तो आराम करना – मैं देखती हूँ नेस में क्या खाने का है ?”

झलक मन ही मन मुस्करा रही थी, शर्मीला और तानिया के मुंह के खाते देख एक बार को आंखे तरेर कर भी उन्हें देखती है|

“जाओ जाओ बाकि तुम लोग क्यों खड़ी हो |” तब तक हेड मैम तानिया और शर्मीला को वहां से रफा दफा करने को कहने लगी इसी बीच कुछ ख्याल आते पलक झलक के कानों में फुसफुसाती है जिससे एकाएक उसके चेहरे के भाव फिर बदल जाते है|

पलक उसे याद दिलाती है कि उनके इन सन्डे बाराबंकी न जाने से मंडे पापा ने कॉलेज के बाद उनसे आकर मिलने की बात कही थी अब अगर वे कॉलेज नही गई तो पापा से क्या कहेंगी और वहां हमे न पाकर पापा हॉस्टल आ गए तब तो उनका सारा झूठ ही पकड़ में आ जाएगा, ये सुनते एकदम से पलक का गला सूखने लगा और झलक फिर कुछ सोचने लगी……

क्रमशः…………….जारी रहेगी कहानी……

One thought on “एक राज़  अनुगामी कथा – 8

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!