Kahanikacarvan

बेइंतहा सफ़र इश्क का – 161

समंदर किनारे बसा सुवली गाँव समुद्री हवा और बादलों की आवाजाही से गुलजार था| आज सुबह से ही बादलों का जमावड़ आसमान में बनने लगा था| काले गुलाबी बादल मिलकर आसमान में कुछ अलग ही छटा बनाए थे|

मनोहर दास और किरन अपने घर के बरामदे में बैठे जहाँ वे अख़बार में गुम थे वही किरन की नज़र आसमान के बिखरते रंगों पर थी| आज आसमान कुछ ज्यादा ही रंगों में घुला हुआ नज़र आ रहा था, किरन भी उसे यूँ गौर से देखे जा रही थी मानो अपनी पसंद का रंग उसमे खोज रही हो|

उसे देखकर कोई भी कहता कि वह कितनी खामोश है पर उसका मन तो कही गुनगुनाता विचरण कर रहा था| उसकी हथेली में इस समय मोगरे में कुछ फूल थे जो हवा संग उड़ते उसके पास आ पहुंचे थे अब उन्हें अपने से स्पर्श करे वह अपनी पलके झपका लेती है क्योकि कोई अदनी सी बूंद अब उसके माथे को चूमती उसकी पलकों पर बिखर गई थी जिससे चिहुकती हुई कहती है –

“बाबू जी लगता है बारिश आएगी – चलिए आप अंदर आराम करिए|”

वे भी अख़बार चेहरे से हटाते हुए आसमान को एक नज़र देखते हुए कहते है –

“हाँ लग तो रहा है पर अभी यही बैठने का मन है बेटी |”

“तो ठीक है मैं आपके ओढ़ने के लिए चादर ले आती हूँ |”

कहती हुई ज्यो किरन उठने लगती है वे उसे टोकते हुए कहते है – “अरे नही इसकी जरुरत नही है|”

“आपको ठण्ड लग जाएगी बाबू जी – मैं अभी आती हूँ |” कहती हुई वह उठकर अंदर चल देती है|

अभी उस पल के एकांत में मनोहर जी फिर अख़बार खोलते ही है कि एक आवाज पर उनका ध्यान बाहर की ओर चला जाता है| वहां का दृश्य देखते वे कुछ असहज हो जाते है|

बरामदे से दिखती बाहर की सड़क पर कई चमचमाती कारे एकाएक आकर रुकी हुई थी और उसमे से निकलते कुछ लोग हाथों में कई उपहार जैसा लाते उन्हें दिख रहे थे| वे जबतक बात समझते तब तक एक अन्य कार से भूमि और दादा जी उतरते हुए उन्हें दिखते है| हालाँकि वे भूमि को पहली बार देख रहे रहे थे पर उसका दादा जी के साथ आना उसका ओहदा अच्छे से बता रहा था|

भूमि वहां आते ही मनोहर दास के चरण स्पर्श करती हाथ जोड़े हुए कहती है –

“मैं भूमि हूँ बाबू जी |”

वे उस वक़्त उसकी गरिमा और सौम्यता को इतना अवाक् हुए देखते रह गए कि बस मौन ही आशीर्वाद में हाथ उठा सके|

पीछे से दादा जी को हाथ पकड़कर लाता मोनू उन्हें एक अन्य कुर्सी पर बैठा देता है| उन्हें देखते वे होश में आते तुरंत उन्हें प्रणाम करते है|

इससे दादा जी मनोहर दास से कहने लगते है –

“तुम्हे देखकर बहुत अच्छा लगा – अब कैसा स्वास्थ है?”

वे भी धीरे से उत्तर देते है – “पहले से काफी बेहतर हूँ चाचा जी |”

वे दो पल एकदूसरे का हाल लेते जैसे उस वक़्त की भूमिका तलाश रहे थे| पर भूमि तो अपनी बात कहने को असब्र हुई जा रही थी| वह आँखों से किरन को खोजती मुस्कराती हुई कहने लगी –

“हमे इतनी जल्दी आने के माफ़ करिएगा पर क्या करे वो घर अपनी छोटी बहु के लिए इससे भी ज्यादा बेसब्र है|”

वह अपनी बात जितना मुस्कराती हुई कह रही थी मनोहर जी उतने ही आश्चर्य से उसे देखे जा रहे थे|

वह आगे कहती है – “मैं जानती हूँ अभी आप किरन को अपने से दूर नही देखना चाहते होंगे पर बेटियां कहाँ रूकती है – बस आज आपसे अपनी किरन को वापस मांगने आई हूँ |”

भूमि की बात पर अभी भी हैरान उसे देखते रहे और वह आगे कहती रही –

“मैं तो पंडित जी को भी साथ ले आती पर सोचा आपसे इजाज़त ले लूँ फिर हम पहले मुहर्त में बस विदाई करा लेंगे -|”

वे आखिर धीरे से पूछ उठे –

“मैं समझा नही बेटी ?”

मनोहर जी के ऐसा कहते भूमि थोड़ी असहज हो गई पर जल्दी ही खुद को समेटती हुई कहने लगी –

“अब जो होना था उसपर हमारा बस तो नहीं चला लेकिन अब और विलम्ब नही होगा – शादी तो हो ही चुकी है बस आपसे विदाई की आज्ञा चाहती हूँ ताकि किरन को उसके अपने घर ले जा सकूँ |”

“वही से तो वह वापस आई है |” वे ये इतनी रुखाई से कहते है कि पल भर को भूमि अचकचा जाती है तो वही दादा जी आश्चर्य से कहने लगे –

“मनोहर अब सब पिछला भूल जाओ – देखो गुजरा समय तो हमारे बस में नहीं था पर आने वाला समय तो हम बदल ही सकते है न |”

“तो क्या बदलना चाहते है आप चाचा जी ?”

“मनोहर मैं तुम्हारे मन की दशा समझता हूँ पर अब देखो सब पीछे छोड़कर हमे नई शुरुवात करनी ही होगी – और सच को स्वीकारना होगा |”

“कैसा सच चाचा जी – किरन तो उसी घर से वापस आई है – तो अब और क्या चाहते है आप ?”

मनोहर जी की बात से दादाजी थोड़े असहज हो जाते है तो भूमि आगे बढ़कर कहने लगती है –

“मैं आपकी नाराजगी को अच्छे से समझती हूँ और आप सही भी है पर उन सब पिछली बातो के कारण आप दो जीवन को कैसे बिगड़ते देख सकते है – आखिर सच तो यही है कि अरुण और किरन की शादी पूरे समाज के सामने पूरे रस्मो रिवाज से हो चुकी है तो अब बस किरन की विदाई की आप आज्ञा दे दीजिए|”

“और ये भी याद है बेटी कि यही इस जगह पर तुम्हारे पति ने क्या कुछ नही कहा था अपने ही घर की बहु के लिए |”

इससे वह उनके आगे हाथ जोड़ती हुई कहने लगी – “तो आज वही घर आपके आगे झोली फैलाए खड़ा आपसे यही अनुरोध कर रहा है कि पिछला सब भूल जाइए और उस घर की उसकी बहु को वापस दे दीजिए बाबू जी |”

“हाथ तो मैं जोड़कर आप से धन्यवाद कहूँगा कि आपने मेरी बेटी को अपने घर में शरण दी – मैं सच में इस ऋण का आभारी रहूँगा पर अब बस यही बात खत्म करते है |”

“ये आप क्या कह रहे है – ये शादी है कोई गुजरा पल नही जो भूल जाए |” भूमि नाराजगी से कहने लगी|

“बेटी मैं आप जैसा बड़ा आदमी नही – बहुत ही मामूली इन्सान हूँ – बस सिवाए एक इज्जत के हमारे पास कोई पूंजी नही – हमारी आपकी तो कोई बराबरी भी नहीं और यही वजह है कि मैं पहले भी इस रिश्ते के खिलाफ था पर अब ऐसे हालात आ गए है कि अब इस रिश्ते को यही खत्म हो जाना चाहिए |”

“ये आप क्या कह रहे है ?”

“सही कह रहा हूँ – बल्कि मैं तो पहले भी यही कहता था कि ये बड़ा बेमेल विवाह है और इसका परिणाम देख ही लिया – मैं अब अपनी बेटी को और दुखी नही देख सकता |”

“वो घर किरन का ही है – उस घर से अलग रहकर न वह खुश होगी न वो घर |”

“पर भूल रही हो बेटी – कि वो इतने समय तक उसी घर में थी – अगर उसे वो घर इतना ही अपना लगता तो वह खुद न बता देती कि वह उजला नहीं किरन है – सोचो और फिर बताओ – क्या इतना विश्वास वो घर जीत सका उसके मन का कि वह खुद आगे बढ़कर अपना परिचय देती – नहीं दे सकी – क्योंकि वहां उसका होना ही सही नही था – उस घर में जहाँ किरन के लिए कोई जगह नही थी अचानक आज कैसे इतनी जगह हो गई – तुम्हारे पति ने ही खुद यहाँ खड़े हुए चीख चीखकर पूरे समाज के सामने घोषणा की थी कि वे रिश्ते को अभी इसी वक़्त खत्म करते है तो जरा बताओ तुम अब किस रिश्ते की बात कर रही हो ?”

“मैं आपसे हाथ जोड़कर सब पिछली बातो के लिए माफ़ी मागती हूँ – देखिए आज खुद डैडी जी ने मुझे यहाँ भेजा है |”

“लेकिन वह खुद तो नहीं आए न ?” वह व्यंगात्मक मुस्कान के साथ कहते रहे – “पता है तुम बहुत अच्छी बहु हो पर बेटी आज मैं तुमसे बस यही प्रार्थना करूँगा कि जरा दो पल के लिए बेटी हो जाओ और तब सोचकर कहो कि क्या उसी घर में किरन का जाना सम्मानजनक होगा जहाँ उसे अपमान और अविश्वास के सिवा कुछ नही मिला |”

“जी बहु हूँ पर बेटी होना कभी नहीं भूलती – इसलिए समझती हूँ आपका मन – लेकिन आप भी तो समझिए – गुजरा वक़्त हम पर भी उतना ही भारी गुजरा है जितना आप पर इसलिए अब हमे आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए – यकीन मानिए उस घर को अपनी नई बहु का दिल से इंतजार है – आप और हमारी परीक्षा मत लीजिए – पहले ही बहुत उतार चढ़ाव से हम गुजर रहे है –|”

भूमि उसके आगे हाथ जोड़े खड़ी थी और मनोहर जी छड़ी का टेक लेते खड़े होते हुए कहने लगे –

“आप बड़े लोग हम मामूली लोगो के घर आए – यही बहुत आभार है आपका – अब बस जलपान जरुर ग्रहण करके जाइएगा |” कहते हुए वह जाते जाते आवाज लगाते हुए कहने लगे – “सारंगी – बेटी जरा मेहमानों को जलपान तो कराओ |”

तब से ऊपरी मंजिल पर खड़ी सारंगी और किरन नीचे का सारा हाल देख सुन रही थी| सारंगी तो यूँ तड़प उठी थी जैसे अभी वही दौड़ जाएगी और मनोहर जी को मना लेगी वही किरन सपाट हाव भाव से उसके पीछे आड़ लिए खड़ी थी|

मनोहर जी को इस तरह उठकर जाते देख भूमि कह उठी –

“ऐसे हमे निराश करके मत जाइए बाबू जी – ये रिश्ता अब इस मोड़ पर है कि इसे सही मुकाम दिए बिना आपको भी चैन नहीं आएगा – |”

वे फिर भी नहीं रुकते और उनसे पीठ करे जाते रहते है|

भूमि भी कहती रहती है – “आज नही तो दो चार दिन आप सोच लीजिए पर इस रिश्ते से इंकार मत करिए जिसे खुद ईश्वर ने तय किया है – नहीं तो जब दादा जी इस रिश्ते को भूल चुके थे तब अचानक नियति आपको उनसे न मिलाती – सब कुछ तो वक़्त के हाथो हुआ – सोचिए ये जुदाई भी वक़्त ने तय कर रखी थी और आज आपके सामने किरन को मांगने भी इसी वक़्त की वजह से खड़ी हूँ – ये शादी सिर्फ बचपन का खेल नही था – अब तो पूरे रीतिरिवाजों और संस्कार से विवाह हो चुका है फिर किसी के भी कह देने भर से ये जन्मजन्मान्तर का रिश्ता नही टूट जाएगा – आपका इंकार दो जिंदगियो की उम्मीद खत्म कर देगा – प्लीज़ आप एक बार और ठन्डे दिमाग से सोच लीजिएगा – मुझे बस आपकी हाँ का इंतज़ार रहेगा |”

कहते कहते भूमि के स्वर नमी से भारी हो आए थे पर मनोहर जी एक बार भी नहीं मुड़े तब भूमि आखिर में धीरे से पूछती है –

“क्या एक बार मैं किरन से मिल सकती हूँ ?”

ऊपर खड़ी सुनती किरन ये सुनकर आने को होती पर अपने बाबू जी को मौन देख अपने कदम तुरंत ही पीछे कर लेती है| और उनकी ख़ामोशी देखते भूमि उनका इंकार समझ जाती है फिर कुछ पल तक उदासी से उन्हें देखती हुई वह दादा जी का हाथ पकडे बाहर निकलने लगती है|

ये सब देखती जहाँ किरन पूरी तरह से खामोश थी वही सारंगी अब उसपर बिगडती हुई कहने लगी –

“आप अब भी चुप है – अरे आप जाकर बाबू जी को मना लीजिए न – चुप क्यों है – आप कुछ कहती क्यों नही – उफ़ –|”

सारंगी की झुंझलाहट पर किरन हौले से कहती है –

“जब कल उनके फैसले पर नही बोली तो आज कैसे बोलूं सारंगी ?” कहती हुई वह अंदर चली गई वही सारंगी बुरी तरह से तड़प उठी| वह अब झट से बाहर की ओर भागती है|

भूमि भीगे मन से कार की तरफ लौट रही थी| सारंगी जल्दी से उसके पास आती है| उसे इस तरह भागते आते देख भूमि उसे गौर से देखती है| सारंगी आ तो गई थी पर कहने को कुछ नहीं था उसके पास, वह आशापूर्ण भाव से उसे देखती रही तब भूमि हल्की सी मुस्कान के साथ कहती है –

“किरन से कहना मैंने जो वादा किया है उसे किसी भी हाल में झूठा साबित नहीं होने दूंगी – हम जल्दी ही वापस आएगे उसे लिवाने |”

कहती हुई भूमि चली जाती है और सारंगी चुपचाप उन्हें जाता हुआ देखती रहती है|

भूमि के जाते अब वह किरन के पास आती है| किरन अब छत पर आ गई थी|  इस समय तक हलकी हलकी बारिश शुरू हो गई थी और मुंडेर का टेक लिए आसमान निहारती किरन चुपचाप खड़ी थी मानो फिर से आसमान में अपने लिए कोई रंग खोज रही हो|

उस पल में सारंगी के पास प्रतिकिया को कोई शब्द नहीं था बस मौन मन के घुमड़ते बादल थे जो तेज तेज उसके मन में शोर करने लगे| उससे न अरुण का हाल छुपा था न किरन का पर वक़्त ने उसे कुछ कहने लायक वक़्त ही नहीं दिया था| वह मौन किरन का चेहरा देखती रही जो भीगा हुआ नज़र आ रहा था पर उस पल वह तय नही कर पायी कि वह चेहरा आंसुओ से भीगा है या बारिश से…!!!

आज यही तक…..कभी कभी दो अलग अलग भावनाओ को एकसाथ लिखना संभव नही होता इसलिए पार्ट आने में देर हुई….. अरुण का स्पेशल पार्ट अगले में जरुर आएगा….क्या सच में कहानी आपके मन की परतो को स्पर्श कर रही है !!! जरुर बताए..

क्रमशः……..

21 thoughts on “बेइंतहा सफ़र इश्क का – 161

  1. Manohar ji galat hai is baar, jb shadi ke baad vo khud bhi apni beti ko galat samajh rhe the to Arun ke gharwalon jitne doshi vo bhi hai,
    Unhe koi haq nhi Kiran ki khushiyon ko thukrane ka…..

  2. Very heart’touching story. Pata nahi kab Arun aur kiran ka milan hoga aur kitna intzaar likha hai inke kismat me 😟

  3. Yaha me Kiran ke pita se sahmat hu pehle bhi vivah ke din bhi Arun ke pita nahi aaye the. Ab aage dekhte hai kya hota hai bahut sundar part ❣️❣️❣️❣️❣️❣️❣️❣️❣️

  4. Lg hi rha tha itti aasani se dono thode hi mil jayge…..but koi baat nhi…..aakhir milna to h hi hm wait krege

  5. Ye kya hua…..kiran ko fir se dur rahna padega…..manoharlal ji khud b to kiran me itna vishawas nhi jaga paye vo jb hospital me the or vhi kiran b thi jb use hosh aata h tb vo unse milne nhi aati ….but unhone use ab fir se arun se dur kr diya….ab lgta h arun khud aayega tb ya deewan shaab khud aayege tb babuji manege

  6. Aap sahi waqt par jarur milayenge dono ko.. par kya kiran ki koi marji nhi.. kyu beti se pucha hi nhi ja rha aur uski zindgi ka faisla bhi kar diya.. k ye rishta nhi hona chahiye… na pehle us se kuch poocha gya.. na ab manohar das ne jaruri samjha ki kiran se pooch le ki vo kya chahti hai.. aur Arun usne to bete se badkar Kiya babuji ke liye .. to fir uska pyar kyu nhi dikh Raha unhe.. bas akash ki baatein yaad hai par Arun ka apnapan..

  7. Ji ha ye kahani humare man ko chhu gyi….
    Muje laga hi tha k kiran arun ka milan itna. Aasan to nhi hone wala… Khani me twist aa hi gya…
    Waiting for next part..

  8. आपकी सारी कहानियां हृदय स्पर्शी होती हैं कि उनसे एक अलग ही जुड़ाव महसूस हो जाता है। अरुण और किरण के जीवन में भी एक दिन खुशियां जरूर आएंगी।

  9. Har taraf kahaniyan aisi kyu chal rahi hai burayi jeete ja rahi hai achayi harti ja rahi hai jis kahani ko dekho sab mein yahi aur ye babuji kitti aasani se keh Diya inhone khud jab apni hi beti pe aarop lagaya wo nahi dikha inhe aaj ye Arun ki wajah se jinda hai ye nahi dikha inhe aur sach kahun Kiran jaise jo apna haq nahi leti ya bolti nahi galat ko galat unhe jhelna hi padta hai hume nahi aaya pasand har baar burayi ko jeete dekhna

  10. Bhut achi kahani h Mam
    ye kahani Dil ko chu jati h..,..sb kuch aise lagta h jese samne kisi film ki tarah chal rha ho aur dub jate h ise padhte time..
    Aur is episode me Kiran k sath bhut galat ho rha h usse koi puchta kyu nhi ki tum kya chahti ho…… Uska babuji khud use nhi samajh rhe h….. May be future me sb thik ho jaye.

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