Kahanikacarvan

बेइंतहा सफ़र इश्क का – 58

पूरा दिन निकल गया पर रूबी एक अदद ऐसा व्यक्ति नही ढूंढ पायी जो उसकी पैसो से मदद कर सके| पूरी तरह से निराश टूटी हुई उसकी हालत हो गई थी| बार बार डॉक्टर की कही बात उसके मस्तिष्क को झंझोड़ देती| वह अपनी माँ के इलाज के लिए पैसो का इंतजाम भी नही कर पायी जिससे उसका मन टूट कर बिखरा जा रहा था|
वह किसी तरह हिम्मत करके फिर हॉस्पिटल गई पर इस बार रिसेप्शन से ही उसे कड़े निर्देश मिल गए कि आज रात तक वह पैसा डिपोजिट नही किया तो उसकी माँ को वहां से हटा दिया जाएगा| उसका मन चीत्कार उठा|
रूबी बिखरी हालत के साथ पाल उमरा ब्रिज के किनारे खुद में सिकुड़ी बैठी थी| सारा शहर अपनी ही रंगीनियों में गुम था किसी को कहाँ फ़िक्र थी कि शहर के किसी हिस्से में दर्द भी बेचैनी से उसी तरह अपनी करवटें बदल रहा है| आवाजो का तीक्ष्ण शोर रूबी के जहन में बार बार गूँज जाता| उसके मस्तिष्क में आवाजों का तूफान उमड़ रहा था|
‘तुम पचास हजार भी न जुटा पाई – जानती हो न इन रुपयों के बिना तुम्हारी माँ की थेरेपी नही हो पाएगी – तुम अपनी माँ की जान लेना चाहती हो क्या !! जाओ और रुपयों का इंतजाम करो नही तो अपनी माँ को ले जाओ ये कोई खैराती अस्पताल नही है |’ अचानक रूबी की चीख निकल पड़ती है पर उसके जहन में आवाजो का शोर बढ़ता जाता है|
आकाश की कही बात अब उसके आस पास गूंजती सी महसूस होने लगती है – ‘इस नंगी दुनिया में भाषणों से पेट की आग नही बुझा करती – आज तुम इंकार कर रही हो क्योंकि अभी भी तुम्हारे मन के किसी कोने में कोई आशा शेष होगी लेकिन जैसे जैसे समय बीतेगा – तुम खुद अपने को इस बाजार में बेचने आओगी – जाओ और पूरी दुनिया में घूम कर देख लो – तुम्हारी कीमत बदल जाएगी पर लोगों की नज़रे नही |’
इन सभी आवाजो के तूफान में घिरी रूबी का मन उसे बार बार झंझोड़ दे रहा था| खुद को वह समझा रही थी पर आकाश की कही बातें उसपर हावी होती जा रही थी| एक तरफ उसकी माँ की जिंदगी थी तो दूसरी तरफ उसका अस्तित्व !! क्या छोड़े क्या बचाए इसी कशमकश में वह घिरी थी|
***
कुछ दूरी पर दो मवाली घूम रहे थे| उसमे से एक ने काफी शराब पी रखी थी| वह लड़खड़ाते हुए बार बार एक ही बात दोहरा रहा था|
“आज – आज अपुन – अपनी रोजी डार्लिंग के पास जाईनगा – अपुन ने अख्खा दिन में एक मालदार का पाकेट मारा – साले ने पाकेट में बहुत पैइसा था – ये – ये हरे हरे पांच पत्ते लहराऊंगा – वो रोजी – वो रोजी है न – तू जानता है न रोजी को – वो साली अपुन को भाव ही नही मारती – अपुन को मामूली आदमी कहती है – उसका आज का मैं – मैं राजा बनूँगा – राजा – क्यों है न अपुन राजा !” वह झूमता हुआ सीना ठोकता हुआ कहता है जबकि उसके साथ बैठा आदमी उसकी ओर कतई ध्यान नही दे रहा था जिससे वह शराबी अपने दोस्त को धक्का देता फिर पूछता है|
“हाँ हाँ – तू राजा होगा – साला खाली पिली मगज ढीला कर रइला है – साले इसमें से अपुन का भी हिस्सा निकाल – समझा !!”
“ये – तू – तू अपुन को जानता है न – अपुन अपनी रोजी के साथ आज रात – तो बाद में अपुन तेरा सारा उधार चुका देइगा – अपुन अपने मरे बाप की कसम खाता है – तेरा – सारा रूपया चुका देगा – पर आज अपनी रोजी – रोजी है न – तू जानता है न रोजी को !”
उसकी दोहराती बात पर अपने शराबी दोस्त को हिडकी देते हुए बोलता है – “अबे चुप – चुप साला – साले तेरी लाइन रोजी से शुरू होकर रोजी पर ही खत्म होती है – आज तू अपुन का सारा रुपया चुकाएगा – क्या – समझा न !”
“देख – देख – आज अपुन रोजी के पास – |”
“चुप अबकी साले तूने रोजी का नाम लिया तो तेरी रोजी और तेरे को किसी अंधे कुँए में धक्का देकर ऊपर से मिटटी डाल दूंगा – अब निकाल – निकाल अपुन का पैइसा |”
“नही – नही – रोजी |”
दोनों की छीना झपटी में पर्स गिर पड़ता है| वो पर्स उठाने जाता है तो उनकी नजर रूबी पर पड़ती है जो एक सुनसान हिस्से पर अकेली बैठी थी|
“ए – ए – उधर देख |”
“किधर – अपुन की रोजी है क्या ?”
“नही – कोई छोकरी बैठी है – चल तो – इसके पास साला माल भी होगा – पर्स तो देख |”
“पर अपुन की रोजी तो पर्स नही रखती – पता नही |”
शराबी का दोस्त उसकी बात अनसुनी करता हुआ उसका कॉलर पकड़कर घसीटता हुआ उसे रूबी की ओर ले जाता है|
“माल है ? ए चिकनी – किसका इंतजार कर राइली है – चल माल खिसका – शान पत्ती दिखाई तो साली गर्दन काटकर यही फेंक दूंगा |” दूसरा आदमी रूबी की तरफ झुककर गले के रुमाल को कसता हुआ कहता है|
आवाज से रूबी अपनी सोच की गहराई से वापस आती उसकी ओर देखती है| उसका चेहरा आंसुओ के पूरी तरह से भीगा हुआ था| वह उसकी ओर उनकी भीगी पलकों के साथ देखती हुई कहती है –
“तुम्हारे पास एक लाख रूपए है ?”
रूबी की बात सुन शराबी के दोस्त का दिमाग सन्न रह जाता है|
“है – तो लाओ – मैं आज अपना सब कुछ लुटाने बैठी हूँ बस मुझे एक लाख रूपए दे दो – मैं – मैं सारी उम्र तुम्हारी गुलामी करुँगी |” अचानक कहते कहते रूबी उनके पैरो की ओर गिर पड़ती है|
“ए – ये क्या बकती है – अपुन के पास एक लाख किधर को होईनगा |”
दूसरा नशे में चूर वाला मवाली ये सुनकर बडबडाता है – “एक लाख रुपया – तब तो सारी उम्र को रोजी अपुन की होइनगी |”
“नही है तुम्हारे पास रूपए – तो तो मैं क्या करूँ – ऐसा करो मुझे बेच दो कही भी पर मेरी माँ की जान बचा लो – मुझे बस एक लाख रूपए चाहिए – नही तो वह मर जाएगी – उसके सिवा मेरा कोई नही |” रूबी बुरी तरह बिलख उठी थी|
उसकी बिलखती आवाज के दर्द से उसका दिल पसीजने लगता है पर जल्दी ही अपने दर्द को छिपाकर अपने नशे में डूबे दोस्त का हाथ पकड़कर उसे दूसरी ओर ले जाता है| इस पर वह शराबी कहता है –
“नही – अपुन को इधरिच ही रहना मांगता – अपनी रोजी है न – रोजी को तू जानता है न ?” वह बोलता जा रहा था और उसका साथी उसे घसीटे लिए जा रहा था|
रूबी बेबस सी होकर रोती हुई ऊपर आसमान की तरफ देखती है –
“मैंने तुम्हारे चर्च में हर सन्डे कैंडल जलाई – तुम्हारे नाम पर जितना हो सका उतना सहर्ष दान किया पर तुमने क्या किया – आज इस बेबसी के दौर में छोड़ मुझे अकेला छोड़ दिया इस मंझधार में – लो – लो अब मैं डूबने को तैयार हूँ –बढ़ा लो अपना हाथ – तोड़ दो मेरी जीवन की डोर |” कहती हुई रूबी पुल में से छलांग लगाने लगती है पर किसी के मजबूत हाथ उसे थाम लेते है| वह उसे नदी की ओर बढ़ने से रोक रहा था जबकि रूबी पागलो की तरह रोती बिलख रही थी –
“छोड़ो मुझे – मर जाने दो – बिना रुपयों के माँ का इलाज नही हो सकता और बिना माँ के मैं जी कर क्या करुँगी – मैं अपनी माँ के लिए इतना भी नही कर सकती तो मुझे मर जाने दो – अब जब मैं नुचने को तैयार हूँ तो कहाँ है दुनिया के सौदागर जालिम भेड़ियो – कहाँ है – आओ और नोच लो मेरी बोटी बोटी – |”
कहते कहते रूबी की आवाज अब उस सन्नाटे में गुम होती वह उन अज्ञात बाँहों में बेहोश हो गई थी|
क्रमशः…………

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