Kahanikacarvan

सुगंधा एक मौन – 8

“क्या – !!!” खाते खाते अतुल चिराग की घूरती हुई आँखों की ओर देखते हुए बोला|

“तुम्हारे खाने पीने का कार्यक्रम हो गया हो तो कुछ और बताओगे !!” दांत पीसते हुए चिराग का स्वर निकला|

“नहीं और कुछ नही चाहिए बस इतना समोसा खा के मेरा पेट भर गया|”

जिस सहजता से अतुल कह गया चिराग के दिमाग में जैसे खून चढ़ गया|

“लगता है मेरे घूंसे खा कर ही तुम्हारा पेट भरेगा|”

ये सुनते अतुल की ऑंखें हवा में टंगी रह गई|

“मैं पूछता हूँ कि अन्दर क्या हुआ ?” वह गरजते हुए चीखा|

“अन्दर क्या होगा – जो आपने कहा था वही मैंने किया – मैम ने बोला आज डेमो क्लास ले लो एडमिशन कल लेना और रही पढ़ाई की तो वो मेरे समझ ही नही आई|” किसी बच्चे की तरह अपनी सफाई पेश करते हुए बोला|

“मैंने इसलिए तुम्हेँ अन्दर भेजा था !!”

“तो किसलिए !!”

दोनों एक दूसरे की आँखों में यही प्रश्न तलाश रहे थे| चिराग को खुद ही लग रहा था कि ये प्रश्न उसके लिए है या खुद के लिए| फिर बात को पलटते वह डैश बोर्ड में रखे पैम्प्लेट की तस्वीर उसकी आँखों के सामने रखता हुआ पूछता है –

“क्या यही है तुम्हारी निशा मैडम ?”

“हाँ |” उस तस्वीर को गौर से देखता हुआ कहता है|

उसके एक हाँ भर से चिराग के दिमाँग में मंथन सा शुरू हो जाता है, उसे आगे क्या कहना या करना है कुछ समझ नहीं आता, अपने अन्दर बेहद खीज भरती साँस खींचता हुआ बिना कुछ कहे पेपर फिर से डैश बोर्ड पर रखते हुए वह कार स्टार्ट कर देता है|

अतुल को लगा था कि ये सिर्फ एक दिन की बात रही होगी, पर दूसरे दिन उसके कॉलेज निकलने से पहले नाश्ते की टेबल पर ही चिराग उसके बगल में पूरी तरह से तैयार होकर बैठ जाता है|

चिराग की नज़र परांठे खाते अतुल पर टिकी थी जिससे असहज होता वह अपनी कुर्सी उससे थोड़ा दूर सरका लेता है|

“अरे वाह चिराग बेटा – तुम भी बड़ी जल्दी तैयार हो गए आज – कहाँ जाना है ?” माँ किचेन से और परांठा लाती हुई चिराग को देखती हुई पूछती है|

“हाँ माँ – अतुल को कॉलेज छोड़ने जाना है न |”

ये सुनते अतुल मुंह में भरे कौर में भी बोल पड़ा – “किसने कहा ?”

उसकी मोटी चबाती हुई आवाज़ शायद माँ नहीं सुन पाई वे तो भाइयों का प्रेम देखकर ही गद गद हो उठी|

“अरे वाह – |”

अतुल जल्दी से अपनी बात कहने के लिए कौर गले के नीचे उतारता बोलने ही वाला था कि चिराग उसकी प्लेट से दूसरा कौर झट से उसके मुंह में ठूंसते हुए बोला – “जल्दी खाओ मेरे प्यारे छोटे भाई नही तो क्लास के लिए देर हो जाएगी |”

माँ अविरल नैनों से देखतीं हुई अब किचेन की तरफ मुड़ जाती है| माँ के जाते अपनी आँखों में जितना गुस्सा भर सकता था उतने गुस्से से वह चिराग को देखता है पर इसके विपरीत चिराग के चेहरे पर सपाट भाव थे|

किचेन से फिर एक परांठा लाती हुई काकी वहां आते ही ज्योंही अतुल की तरफ बढ़ाती है, झट से अतुल उसका भी कौर तोड़ने लगता है तो चिराग उसके हाथ से प्लेट छीनता हुआ काकी की ओर बढ़ाते हुए कहता है – “अब नहीं खाना इसे – ज्यादा खाएगा तो क्लास में नींद आ जाएगी न |”

ये सुनते हक्के बक्के हुए अतुल को लगभग बाजु पकड़कर वह बाहर की ओर ले जाने लगता है, तब अतुल के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे बकरे के चेहरे पर तब आते है जब कसाई उसे खीँच कर जिबह के लिए ले जाता है और बेबसी में वह कुछ नहीं कर पाता|

यंत्रवत अतुल को कॉलेज छोड़ने के बाद उसे पुकारता हुआ चिराग कहता है – “सही समय पर यही मिलना – मैं आऊंगा लेने |”

अतुल इसे आखिरी फैसला मान चुपचाप अन्दर की ओर चल देता है, उसके वे दोस्त जो उसके भाई को देखते इधर उधर चले गए थे, अब फिर से अतुल की तरफ आते हुए उसके उतरे मुंह को देखते हुए प्रश्न करते देख रहे थे

“कभी फांसी देते जल्लाद को देखा है – नही तो देख लेना दोपहर में आ रहा है मेरा भाई मुझे लिवाने|”

अतुल के रुआंसे चेहरे को देख उसके दोस्त समझ नहीं पा रहे थे कि वे हँसे या उसके संग शोक मनाए|

आखिर सही समय पर अतुल उसे सड़क पर ही खड़ा मिल गया, उसे देख चिराग मुस्कराता हुआ उसकी तरफ का कार का दरवाज़ा खोल देता है और चन्द की क्षणों में वे निशा कोचिंग के पास आकर रुकते है|

कार से उतरने से पहले उसे ढेर हिदायतें देता चिराग कह रहा था – “एडमिशन लेना पर पैसे एक साथ मत देना – कह देना की दो क़िस्त में तुम फीस दोगे – समझे |”

“पर पूछा क्यों तो क्या कहूँगा ?”

“मुझे नहीं पता – |”

“नही पता !!” बेचारा सा मुंह बनाए वह दो पल तक अपने भाई की ओर ताकता रहा फिर अपने लटके मुंह के साथ कोचिंग की ओर बढ़ गया|

वही क्लास वही मैम और अतुल का वही लटका मुंह, किसी तरह से क्लास को अटेंड करने के बाद अब वह निशा मैम के सामने खड़ा बता रहा था कि वह फीस दो क़िस्त में दे पाएगा तो वह भौंह उचकाती उसकी ओर देखती हुई पूछती है –

“एनी प्रोब्लेम !”

“एक्चुली मैम मेरे पापा – मतलब मेरे बेचारे पापा एक साथ पैसा नही दे पाते – उनका बहुत छोटा बिजनेस है न|” अतुल को उस पल ये कहते हुए ऐसा लग रहा था कि अभी पीछे से उसके पापा आएँगे और कस पर टीप मारते हुए उससे पूछेंगे ‘कौन से बेचारे पापा !!!’

“इस्ट्स ओके – यू कैन |” संक्षिप्त सा उत्तर देकर वह एक फॉर्म उसकी तरफ बढ़ाती हुई कहती है – “इसे फिल करके दे देना ओके और हाँ ये नोट्स अभी लेना चाहते हो तुम !”

अतुल को लगा अगर वह दिखावे के लिए भी नोट्स ले लेगा तो कही उसका भाई इसे भी उससे जबरन न लिखवा डाले इस डर से वह तुरंत बोल पड़ा – “मैम ये मैं कल लेलूँगा |”

“ओके |”

सर झुका कर हाँ कहता हुआ वह अब उस सड़क के किनारे तक आता है जहाँ कार में ही बैठा चिराग उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था|

उसके आते फिर अपने ढ़ेरों सवालों के साथ वह अतुल को देखता है|

“बता दिया क़िस्त के बारे में और फॉर्म दिया है भरने के लिए |” कहते हुए अतुल किसी फालतू कागज की तरह उसे अपने भाई की ओर बढ़ाते हुए कहता है – “अब मैं नहीं जाऊंगा कल से |”

“क्यों !!” उस कागज को आगे पीछे पलट कर देखते हुए चिराग एकदम से अतुल की तरफ देखता है|

“मैं क्यों पढ़ रहा हूँ मैथ्स ?”

अतुल बुरा सा मुंह बनाते हुए चिराग की ओर देखता है जो धीरे से मुस्कराते हुए अब कह रहा था – “तुम्हें अभी दद्दा की दुकान से छोले भठूरे खाने है !!” चिराग ने अतुल की झट से कमजोर नस पकड़ी और सच में वह छोले भठूरे का सुन बाकी सब भूल गया|

दिन में आधी फीस देने के बाद अब दूसरी क़िस्त देने के लिए चिराग ने देर शाम का वक़्त चुना और अतुल को लिए वह अपनी कार अब ठीक कोचिंग के सामने खड़ा कर देता है, वह जानना चाहता था कि इस घर में उसके साथ और कौन कौन रहता है पर काफी देर से बार बार सही वक़्त के इंतजार में वह अपनी कलाई की घड़ी देखता तो अतुल चिराग का चेहरा| आखिर ठीक सात तीस पर जब धुंधला अँधेरा घिर आया तो वह फीस देने के लिए अतुल को उस ओर भेजता है और कार का शीशा ऊपर चढ़ा कर खुद वही से कौन दरवाज़ा खोलने आता है ये देखने सतर्कता से अपनी ऑंखें वही गड़ाए रहता है|

अतुल के इंकार की तो कोई कीमत ही नहीं थी, उसे हर हाल में भाई का कहा करना ही था, वह भी मन मारे उस ओर बढ़ गया, कोचिंग के वक़्त खुला रहने वाला मुख्य दरवाज़ा अभी कस कर बंद था तो अतुल कॉल बेल को ढूंढता हुआ उस पर अपनी एक बार उंगली छुआ देता है, कोई जवाब नहीं आता, वह दोबारा थोड़ी और देर तक दबाता है, अब किसी के आने की आहट उसके कान सुनते है|

वह दरवाज़ा खुलने का इंतजार करता है पर दरवाज़ा नही खुलता बल्कि कोई आवाज़ दीवार लाँघ कर उसकी तरफ आती है|

“कौन है ?”

आवाज़ से वह पहचान जाता है ये निशा मैम की आवाज़ है|

“मैम मैं अतुल – फीस देने आया था|”

“इस वक़्त -|”

अतुल को भी लग रहा था कि उसके भाई ने उसे बुरी तरह फंसा दिया लेकिन मरता क्या न करता|

“सॉरी मैम – मेरे पापा ने अभी पैसे दिए |”

“कोई बात नही बच्चे तुम कल आकर फीस दे देना – ओके |”

आवाज़ जैसे धीमी होती गई, अतुल समझ गया कि दरवाज़ा नही खुलेगा तो तुरंत वह उलटे पैर वापस आ गया|

इधर उस चेहरे की एक झलक पा लेने की बेकरारी के मंसूबे पर पानी फिरते चिराग अतुल के आते एकदम से उसपर बरस पड़ा |

“तुमसे तो कोई काम होता ही नहीं – बेकार – बेवकूफ हो तुम |”

कहते हुए कार विपरीत दिशा में मोड़ते हुए घर की ओर चल देता है और अतुल मरमरी हालात में कभी हाथ में पकड़े पैसे देख रहा था कभी भाई का गुस्से में तमतमाँ या चेहरा|

अगले दिन फिर कोचिंग जाते समय अबकि नई शर्त सुन अतुल एक दम से उखड़ गया|

“फोटो खींचू – क्या बात कर रहे  है – मैं मैम की फोटो कैसे खीँच सकता हूँ ?”

“मुझे नहीं पता |”

“ये भी नहीं पता |” अतुल का मुंह और छोटा हो गया|

आखिर चिराग थोड़ा समझाते हुए अतुल को कहता है – “देखो किसी तरह से भी सेल्फी वेल्फी लेते एक बार फोटो लाओ – तो तुम्हारी मैथ्स की कोचिंग खत्म |”

ये तुरुप का वो पत्ता था कि एक ही चाल में अतुल निढाल होता हुआ कह उठा – “ओके – आज ही |” फिर थम्स अप दिखाता पूरे उत्साह से उस कोचिंग की तरफ बढ़ जाता है|

अतुल को अपने तेज दिमाग पर भरोसा था और वह बोर्ड का उतारने के बजाए उस बोर्ड की तस्वीर लेने की बात मैम से कहता है तो वह सहज ही इसकी इज़ाज़त दे देती है|

अतुल झट से फोकस कर तस्वीर लेने की वाला था कि किसी बच्चे के कोई प्रश्न करने पर मैम उसी एक क्षण बोर्ड की तरफ मुंह कर लेती है और अतुल के सब किए कराए पर पानी फिर जाता है|

क्लास खत्म होते हमेशा की तरह अपने निश्चित स्थान पर चिराग कार लिए खड़ा था और फिर उसका मन अधीर हुआ जा रहा था और तस्वीर ले ली पूछने पर अतुल के हाँ कहते तो बल्लिओं उछल पड़ा उसका मन|

“पिज़्ज़ा खाना है !!”

अतुल ने  झट से हाँ में सर हिलाते हुए मोबाईल अपनी पॉकेट के अन्दर कर लिया कि खाने के बाद ही वह तस्वीर दिखाएगा, अगर माँ र ही खानी है तो पिज़्ज़ा खाने के बाद खाएगा|

घर आने के बाद अपना मोबाईल भाई को देकर वह गधे के सींग की तरह तुरंत भाई की नज़रों के सामने से गायब हो गया|

आखिर बकरा कब तक अपनी खैर मनाता, दूसरे दिन भरे गुस्से में वह दोनों हाथों से उसका गला पकड़े था|

“तुमसे एक काम ठीक से नहीं होता – ये फोटों खिंची है तुमने !!”

“भईया छोड़ो दर्द हो रहा है – |”

चिराग झटके से उसे छोड़ देता है|

“आपको पता है किसी भी लड़की की तस्वीर उसकी बिना इज़ाज़त के खींचना कितना बड़ा जुर्म है ?”

“अच्छा – मैंने देखा तेरा मोबाईल कितनी तस्वीर खींचता रहता है कॉलेज की तब हर तस्वीर की लड़की से पूछता है क्या ?”

तभी मम्मी वहां आती हुई दिखती है तो झट से चिराग अतुल के कंधो पर हाथ फैलाता हुआ चुपचाप खड़ा हो जाता है|

मम्मी फिर भाईयों का प्रेम देख गदगद हो उठती हुई दूसरी ओर चल देती है| मम्मी के जाते फिर झट से अतुल के सामने आता हुआ चिराग कहता है – “आज किसी भी तरह से तस्वीर लोगे समझे |”

इस पर तुरंत बिदकता हुआ अतुल कह उठा – “मैंने कहा था कि आज से मैं नहीं जाऊंगा |”

चिराग कुछ भी कहने के बजाए बस अपनी तीखी नज़रे उसपर गड़ा देता है जिससे अतुल कह उठता है – “ओके बस आज और लास्ट |”

इस तरह फिर आज उसे उसी कोचिंग में अपना मन माँरे जाना पड़ता है| अभी अतुल के जाने के बाद चिराग एक लम्बे इंतजार के लिए कार का स्टीरियो ऑन कर ही रहा था कि अतुल को वापस आते देख वह एकदम से चौंक जाता है|

घर वापस आने तक आज अतुल उसकी एक नहीं सुन रहा था, चिराग किसी तरह से उसे पटाने की कोशिश में कभी पॉकेट मनी बढ़ाने की बात करता कभी कुछ खाने का लालच देता पर आज तो जैसे वह आपे से बाहर हो गया था और बुरी तरह से रूठता हुआ टैरिस के किनारे पड़ी कुर्सी पर अपने सीने पर हाथ बांधें बैठता हुआ बोला – “अपनी जान दे दूंगा पर यहाँ से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाऊंगा – कुछ भी करा लेते हो मुझसे – कल पता है – मैथ्स का टेस्ट लेने वाली है तब मैं क्या करुगा – मुझे अब नहीं जाना तो बस नहीं जाना – मुझे नहीं करानी अपनी बेइज्जती |”

इससे पहले की चिराग कुछ कहता उनके पीछे से कोई जानी पहचानी आवाज़ गूंज उठी – “और भाई क्या हो रहा है?” ये अमित की आवाज़ थी जो उनकी हालात को कुछ कुछ अंदाजा लगाता वही आता ठीक अतुल के बगल में बैठता हुआ उसके कंधे पर अपना हाथ फैलता हुआ कह रहा था – “क्यों बच्चे की जान ले रहे हो – हुआ क्या ?”

थोड़ी सी हमदर्दी से अतुल इतने दिन से अपने हुए एक एक अत्याचार को बताने लगा, इस पर अपनी हँसी पर किसी तरह से जब्त किए अमित सब सुनता हुआ कहता है – “भाई ये तो सरासर जुर्म है |”

ये सुन अतुल प्यार और भरोसे की चाह में अमित की तरफ और झुक जाता है |

“क्यों बेवज़ह मासूम बच्चे पर जुर्म ढाह रहे हो – जिस बेचारे को फिजिक्स केमिस्ट्री ही बड़ी मुश्किल से समझ आती है उसे मैथ्स पढ़वा रहे हो |” कहकर चिराग और अमित दोनों ताली माँ रते है जिससे एकदम से खड़ा होता अतुल कह उठता है –

“आप दोनों ही दुनिया के सबसे बुरे भाई हो – मैं जा रहा हूँ और अबसे कोई काम नही करूँगा आपका |” कहता हुआ तुरंत वहां से निकल गया तो अमित की हँसी छूट गई|

“यार तू भी क्या गजब है – इतने दिन में तूने क्या क्या नाटक करा डाले इससे |”

“क्या करता |”

अमित चिराग के सामने खड़ा होता हुआ कहता है – “इस पागल पंथी के बजाय खुद जाना चाहिए था न वहां |”

“मुझे – !!!”

“हाँ तो और किसे – कल ही तू वहां जाएगा और सारा माजरा ठीक से जानेगा – एक शक्ल देखने के लिए इतना नाटक |’

“सिर्फ शक्ल नही और भी बहुत कुछ कि और कौन है वहां !” कहते कहते उसकी ऑंखें किसी अनचाही बात न होने की जैसे दुआ कर उठी|

“अरे जो भी है – उसे जानने खुद जाओ – अच्छा दिखाओ तो क्या तस्वीर खींची अतुल ने |”

चिराग बेमन से मोबाईल की एक तस्वीर अमित की तरफ बढ़ा देता है जिसे देख अमित की हँसी फूट पड़ी – “बढ़िया फोटोग्राफी की |”

“हाँ बालों की फोटो लाया मूरख |”

खीजता हुआ चिराग बोला तो अमित कह उठा – “अच्छा ये अगर वही है तो तूने तो बोला था सुगंधा के बाल लम्बे है यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं है |” एक पारखी की तरह वह बोला|

“अरे तो बाल कटवाए नही जाते क्या !!”

“मुझे तो ऐसा नहीं लगता – मेरा अनुभव तो कहता है लम्बे बाल रखने वाली लड़कियां अपने बालों से बहुत प्यार करती है और बमुश्किल ही उन्हें कटवाती है|

“तुम्हें कुछ ज्यादा ही पता है लड़कियों के बारे में |” अबकि कनखियों से घूरते चिराग पूछता है|

“हाँ क्यों नहीं होगा – तृप्ति जैसी लड़की के साथ रहते सौ लड़कियों के जीवन का अनुभव प्राप्त हो गया |” अबकि दोस्त की बेचारगी पर चिराग की हँसी निकल पड़ती है|

अमित की हौसलाअफजाई से चिराग वाकई अगले दिन तय करता है खुद को निशा कोचिंग जाने के लिए|

क्रमशः…….

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