Kahanikacarvan

हमनवां – 10

बुलेट सधी सी चली जा रही थी| रात के ठन्डे, खुले आकाश के नीचे सड़क के विस्तार को चीरती बुलेट की धक धक मानों किसी की धड़कन बन गई थी| समर के पीछे बैठी ऋतु एक हाथ का हलका भार समर के कंधो पर दिए किसी कल्पना में मानों खो सी गई थी| उसके चेहरे पर अभी भी हलका मेकअप मौजूद था जो जरुरी भाग होता है किसी नृत्य के समय ताकि नृत्यांगना की भंगिमा और स्पष्ट हो सके, अभी सोचने की मुद्रा में उसकी ऑंखें होठों की मुस्कान के साथ जैसे घुलमिल सी गई थी|

ऋतु समर की ओर हलके से झुककर बुलेट रोकने को कहती है ताकि हवा में फडफडाती अपनी साड़ी वह ठीक कर सके| समर झट से ब्रेक लगाकर रोक लेता है| वह किसी नदी के ऊपर बना पुल का हिस्सा था जिसपर रात की चांदनी बिखरी पड़ी थी| बुलेट से उतर कर ऋतु अपनी साड़ी थोड़ा सही कर समर की ओर देखती है जो बुलेट से उतर रहा था|

ऋतु साड़ी ठीक कर चुकी थी, समर उसके सामने खड़ा था| अब दोनों एक दूसरें की आँखों के दरिया में कूद चुके थे और अब कहीं नहीं जाना चाहते थे|

‘देखो आज पूर्णिमा की रात है न – चारोंओर कैसा आफताब सा बिखरा है|’

‘हाँ|’ समर की नज़रें बहुत कुछ कह रही थी पर शब्द बौने हो चले थे|

ऋतु नदी की ओर हौले से झांकती है – ‘इस शांत नदी को देखकर लग रहा है जैसे इसे कही नही जाना बस युहीं रात की चांदनी में लिपटे रेत के बिछौने में पड़े रहना है इसे|’

‘हाँ|’

‘मैं बहुत खुश हूँ – मुझे आज सारी कायनात जैसे अपनी ख़ुशी में झूमती सी नज़र आ रही है|’ ऋतु सच में अपनी जगह पर खड़ी खड़ी गोल घूमती झूम जाती है, समर एक टक उसकी ओर देखता रह जाता है बस|

‘आज लगा जैसे माँ की इच्छा मैंने पूरी कर दी अब मैं कभी डांस नहीं छोडूंगी – देखना मैं अपना एक स्कूल खोलूंगी – फिर कभी किसी की डांस को लेकर इच्छाएँ अधूरी नहीं रहेंगी – हर उम्र की महिलाओं को सिखाउंगी मैं – देखना मैं शादी के बाद भी डांस को नहीं छोडूंगी|’

‘हाँ मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा|’

दोनों जैसे अपनी रौ में बहते बहते रुक से गए, ये क्या कह गए| दोनों के होंठ लरज गए| ऋतु हौले से पीछे फिर नदी की ओर देखने लगती है और समर चलता हुआ कब उसके पास आ गया वह नहीं देख पाई|

‘ऋतु काश मैं शब्दों से अपनी समस्त भावना व्यक्त कर पाता लेकिन तुम्हें देखते ही जैसे मेरे सारे शब्द तुम्हारी झील सी आँखों में खो जाते है और मुझे प्यासा प्यासा सा तुम्हारी मौजूदगी के तट पर छोड़ देते है|’

वह समर की आँखों में प्रेम का विस्तार सा होता देख रही थी|

वह बढ़कर उसका हाथ थाम लेता है, ऋतु विरोध भी नही करती| समर और नज़दीक आता है, ऋतु बिल्कुल पीछे नहीं हटती| समर उसका माथा चूम लेता है ऋतु अपनी देह उसकी देह पर छोड़ देती है| नदी में लहरे सी उमड़ आती है, एक बादल का आवारा टुकड़ा एक क्षण के लिए आकाश की चांदनी को अपने विस्तार से ढक लेता है| वो पल नेह के मौन साक्ष्य बन जाते है उस क्षण|

***

एक अज्ञात नम्बर पर बात करने के बाद से ही जय के चेहरे के हावभाव कुछ बदल से गए थे| अब उसे  उस एकांत जगह जाना था जो उस अज्ञात व्यक्ति द्वारा बताई गई थी|

हाइवे के सुनसान अँधेरे हिस्से में अपनी बुलेट खड़ी कर अपने चारोंओर वह देखता है, फिर अगले ही क्षण कोई तेज़ रौशनी ठीक उसके सामने आकर मध्यम पड़ती है| फिर एक खट की आवाज़ से गाड़ी का दरवाज़ा बंद कर उससे कोई जाना पहचाना बाहर निकलता है|

गाड़ी की हेडलाइट बंद होते वहां के अँधेरे और गहरा जाते है| नज़र गड़ाकर वह देखता है ड्राइविंग सीट से निकलकर उसके सामने गौतम खड़ा था, गौतम है तो वे जरुर होंगे, जय सोच ही रहा था कि दूसरी तरफ से अश्विन कुमार भी निकल कर उसकी तरफ आते है|

‘कैसे हो जय?’ उनका हलका स्वर जय सुनकर भी अनसुना कर देता है|

‘समझो कोई मजबूरी थी जिसके कारण मैंने तुम्हेँ बुलाया – नहीं तो…|’

‘नही तो आपका रसूख ही बहुत है|’ जय दांत पीसते हुए बोला|

अँधेरे में चेहरे के भाव स्पष्ट नही थे लेकिन शब्दों की धार मन की कडुवाहट को दिखा रही थी| अश्विन थोड़ा और जय की तरफ आगे आता है और गौतम उन्हें उनके एकांत में छोड़ उनसे काफी पीछे हो जाता है|

‘बहुत साल हुए – अभी भी इतनी कडुवाहट – जय समय हर घाव भर देता है|’

‘कुछ घाव ताउम्र नहीं भरते – खैर आप वो कहे जिसके लिए आपको मुझसे मिलने इन रात के अंधेरों का सहारा लेना पड़ा|’ अपना एक पैर पास खड़ी बुलेट के बम्पर पर रखता हुआ कहता है|

‘प्रेरणा ..|’

‘मत लीजिए भाभी का नाम – एक हत्यारे के मुंह से अपनी माँ समान भाभी का नाम मैं बर्दाश्त नही कर सकता|’ जय चीख पड़ा|

‘जय मैं बार बार अपनी सफाई तुम्हारे सामने पेश कर चुका हूँ और तुम क्या समझते हो ये घाव सिर्फ तुमपर लगा|’ आवाज़ की आद्रता शब्दों में झलक आई|

‘तभी तो आज एक सच तुमसे कहने आया हूँ|’

‘मुझे अब आपके किसी भी सच में कोई दिलचस्पी नही बस वो कहे जो कहने आपने मुझे यहाँ बुलाया है|’

‘प्रेरणा का अंश..|’

जय की ऑंखें अँधेरे में और फ़ैल गई, वह धीरे से बुदबुदाया –‘अंश!!!’

‘प्रेरणा को खो देने के बाद मैं उसकी निशानी नहीं खोना चाहता था इसलिए सबसे छुपाकर उसे अपने से भी दूर रखा – दस साल से उसे सारी दुनिया और तुमसे भी छुपकर मैंने रखा था लेकिन अचानक जाने कहाँ वह कुछ दिन से गायब हो गया – मैं उसके होस्टल खुद जाता था – कभी उसे यहाँ नहीं बुलाया – पर एक दिन जिद्द में अड़ गया कि वह उस घर में आना चाहता है जहाँ मैं रहता हूँ – किसी रात को मैं उसे ले भी आया फिर एक दिन घर से ही लापता हो गया वो – मैंने कहाँ कहाँ नही खोजा उसे – चिट्ठी लिखकर गया है कि परेशान मत होइएगा वह कुछ दिन में खुद ही लौट आएगा – आज सात दिन हो गए और उसकी अभी तक कोई खबर नही – क्यों गया कहाँ गया – कुछ समझ नहीं आ रहा तब मुझे लगा तुम कुछ अपनी तरफ से पता कर सको तो..|’ वे कहते कहते खामोश हो जाते है कि जय कुछ कहे पर जय तो जैसे कहीं खो गया था|

‘जय..!!’ वह जय की चेतना को जगाता है|

‘आपने इतनी बड़ी बात आज तक मुझसे छुपा कर रखी|’ जय के कसे शब्द बोझिल हो रहे थे|

‘जरुरी था उस समय|’

जय की आँखों के सामने जैसे सारा अतीत चलचित्र सा घूम गया| अपनी भाभी प्रेरणा का चेहरा जो उनका अपनी औलाद सा ख्याल रखती थी| उनकी आखिरी घड़ी में कितना आना चाहता था वह उनके पास पर अपनी ही कसम देकर रोक दिया और अपनी पुलिस की ट्रेनिंग पूरी करने की बात कही|

तब अंश ही तो आने वाला था लेकिन एक खबर आई कि घर में आग लग गई और उसका सब कुछ उसमे जलकर राख हो गया| आखिरी समय अपनी भाभी का दर्शन तक नहीं कर पाया वह| सब कुछ खत्म होने के दुःख से उबारता रहा खुद को क्योंकि उसके बड़े भाई अश्विन कुमार की छुपी अपराधिक दुनिया उनका सारा अतीत निगल गई और सदा के लिए उनके बीच गहरी खाई छोड़ गई जिसे न जय पाटना चाहता था और न अश्विन कुमार कभी पाट पाये|

***

जय आकर झट से अंश को गले लगा लेता है, अपने मन की भावनाओं को और समेट पाना उसके लिए दुश्कर हो गया था| अंश अनबूझा सा उसकी पीठ की ओर देखता रहा और जय उसकी पीठ की ओर देखता अपनी भीगी पलके झुपाए रहा|

अंश के सो जाने के बाद जय छत पर अकेला बहुत देर टहलता रहा और मन ही मन अतीत के झरोखों के पार की दुनिया में खुद को महसूसता रहा|

बचपन से जिस भाई ने पिता की तरह उसे बड़ा किया आज उसी के खिलाफ वह खड़ा है| ये सोच कभी उसका मन अपने प्रति ही घृणा से भर उठता| उसे अपने से दूर रखकर भाई ने उसकी पढ़ाई के लिए अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन वह हर बार अपने भाई के पास आना चाहता पर उनके ढेर बहाने उसे हमेशा उनसे दूर रखते| जब एक दिन पता चला किसी से उनकी शादी हो गई, वह दौड़ा चला आया| फिर भाभी के स्नेह भरी दुनिया ने जैसे ममता की उसकी सारी कमी पूरी कर दी| पर काश एक वो दिन नहीं आता जब उसे पता चला कि उसके भाई के इर्दगिर्द उसी के गुनाहों भरी दुनिया है, जय के सामने एक तरफ भाई के त्याग आते जो सहते हुए उन्होंने जय की दुनिया में कभी कोई तरह की कमी नहीं रखी तो उस पल एक अपराधबोध से उसका मन भर उठता|

वह अपने भाई को उस दुनिया से निकालना चाहता था पर दलदल से निकलना आसान था इससे नही| फिर भी भाई ने आश्वासन दिया कि वह सब कुछ छोड़कर प्रेरणा और उसके साथ अपनी नई दुनिया बसाएगा| आखिर यही तो वादा किया था कि जब तक वह अपनी पुलिस की ट्रेनिंग कर के वापस आएगा उसके सामने नई दुनिया होगी| पर क्या  पता था कि चन्द दिनों में सारी दुनिया ही लुट जाएगी| मन भर उठा| रात के अंधेरे उसके आंसु छुपा ले गए| जय जल्दी से अपना चेहरा पोछकर तय करता है कि अंश के साथ अब कुछ भी उसके जीवन जैसा नहीं होगा| ये सोचते जैसे खुले आसमान में तारों की लय सी उसकी भाभी का चेहरा स्पष्ट हो आया|

***

इरशाद अप्पी के बुलाने पर आता है| उसने जिस जिद्द में अपनी अप्पी का घर छोड़ा था वही बात हर बार उसे मजबूर करती थी अप्पी के पास वापस आने के लिए| वह इंकार भी नही कर पाता| आज सुबह से ही इरशाद को कई बार फोन कर कर के याद दिला चुकी थी कि आज शाम उसे जीजू भाई की खाला की बेटी नाज़िया की सगाई पर आना है|

इरशाद हाथ में मोबाईल लिए बार बार मेसेंजर खोलकर पुराने भेजे मेसेज  देख रहा था, हमेशा की तरह उसके ढ़ेरों सवालों जवाबो पर एक स्माइली चस्पा कर नाज़ मौन रहती लेकिन इरशाद उसी मुस्काते संकेत को नदी के तेज़ उफान में तिनके का सहारा मान देर तक उसी क्षितिज पर अपना इंतजार छोड़ देता जहां से वह अपना आखिरी सन्देश  देकर जाती थी|

अप्पी के साथ जैसे वह जबरन खड़ा था वहां|

‘ये निशाद खाला है उनकी  और ये हुसैनगंज की दादी जान वाली खाला – सबीहा खाला – उन्हीं की बेटी नाज़िया की सगाई है कल|’ अप्पी जैसे पूरे खुमार में थी एक साथ बैठे सारे कुनबे से मिला देना चाहती थी|

‘सलाम वालेकुम..|’ जल्दी कहकर इरशाद अप्पी को इशारा कर वहां से निकल जाता है|

‘ओह्ह अभी आया है न – भूख लगी होगी|’ भरपूर मुस्कराती वह वहां से निकलकर इरशाद के पीछे पीछे जल्दी से वहां आ जाती है जहाँ इरशाद और उनके सिवा कोई नहीं था|

‘क्या अप्पी आप भी न वो नाज़िया की अम्मी थी और उन्हीं के सामने लाकर खड़ा कर दिया मुझे|’ इरशाद एक दम से बिफ़र पड़ा|

‘हाँ तो कोई बात नही वो उस बात को भूल चुकी है नही तो क्या अपना शहर छोड़ हमारे यहाँ आती सगाई की रस्मअदायगी के लिए और फिर कोई रिश्ता थोड़े ही तय हुआ था उसके साथ तुम्हारा सिर्फ बात चली थी तुमने न कर दिया बस तब भी उनकी खाला तो रहेंगी न वे|’ अप्पी की बातों में भी थोड़ी तल्खी उभर आई|

‘मुझे क्यों बुलाया आपने – मुझे अच्छा नहीं लग रहा|’ इरशाद सर पकड़े वही बैठ गया|

अप्पी स्थिति समझती हुई उसके पास आकर बैठ जाती है –‘तुम्हेँ पता है अबकि तुम्हारे जीजू भाई ने तुम्हेँ बुलाया है|’’

इरशाद सर उठाकर उनकी तरफ हैरत से देखता है |

‘हाँ मैं भी हैरान थी पर पहली बार उन्होंने कहाँ तो मैं कैसे इंकार कर सकती थी – वे खुद चाहते थे कि इस जश्न के वक़्त तुम यहाँ आओ|’ उनके चेहरे पर हलकी मुस्कान तैर गई|

‘और भला क्यों?’

‘क्यों!! अरे जो भी सोचा हो पर तुम आए मुझे बहुत अच्छा लगा – अभी तो कई पकवान तुम्हारा इंतजार कर रहे है|’ अप्पी किसी छोटे बच्चे सा बहलाती उसका हाथ पकड़ उसे उठाने का प्रयास करती है| पर जब इरशाद को खींचने पर भी वह नही उठता तो जबरन गुस्सा अपने चेहरे पर लाती हुई कहती है –‘वल्लाह  तो मेरा छोड़ा भाई अपनी अप्पी की पकड़ से ज्यादा ही मजबूत हो गया है क्या|’

इस पर इरशाद के चेहरे पर भी हलकी मुस्कान तैर जाती है – ‘ऐसा तो कभी नहीं होगा|’ कहता हुआ झट से खड़ा हो जाता है|

‘अप्पी सच में जरुरी काम है रुक नहीं पाउँगा|’

‘अच्छा ठीक है पर अभी तो चलो|’ आखिर धकेलती उसे बाहर ले जाती है|

फिर दोनों साथ में कमरे से बाहर निकलते है| उस पुश्तैनी कोठी में मेहमानों का आना जाना बड़ी आम बात थी| कल सगाई की रस्म अदा होगी  ऐसा पहली बार न होगा| ये इस घर का रिवाज़ था जिसे अभी तक वे निभाते आ रहे थे|

अहमद मियां की खाला जो दूसरे शहर रहती थी आज अपने कुनबे सहित अपनी दूसरी बड़ी बेटी नाज़िया की सगाई के लिए यहाँ इकट्ठा हुई थी क्योंकि उनका होने वाला दामाद भी इसी शहर का था और अहमद मियां का उनके परिवार से व्यावसायिक तालुकात भी था तो अपनी मसरुफ़ियत के कारण समय ज़ाया न हो तो सगाई यहीं कोठी में रख ली गई थी और खानदान में उनका इतना रुतबा तो था ही कि उनकी नाफ़रमानी कोई नहीं करता था|

इरशाद और अप्पी सीढियों से नीचे जा रहे थे कि सामने किसी खिले चेहरे के आते एक दम से वह रुक गई| वह उनको सलाम करती है| इरशाद उस चेहरे के नूर को देखता रह जाता है| फूलों की पंखुड़ी जैसे  चेहरे पर टिकी नदी के दो किनारों सी आंखे, मानों काजल का वहां होना काजल की शोभा थी, सुर्ख गुलाबी गालो के किनारों पर बार बार झूल झूल कर आते बड़े बाले मानों बार बार उन गालो को चूम लेते थे, वे गुलाबो की पंखुड़ी से होंठ उसे सामने देख कर भी अनदेखा  कर अब अप्पी से मुखातिब थे|

‘अरे नूर – |’ अप्पी उसकी तरफ देखती हुई उसकी आँखों की तलाश जैसे समझ जाती है|

‘सब टैरिस में है इस वक्त|’

उसे शायद अपने सवालों का जवाब मिल गया था वह आँखों से शुक्रिया कहती मुस्करा कर बिल्कुल इरशाद के बगल से निकल जाती है|

इरशाद पलट कर दुबारा उसे देखना चाहता था, उसकी आवाज़ सुनना चाहता था पर अप्पी की मौजूदगी में अपनी आँखों को जबरन बंद कर लेता है|

अप्पी चलती हुई कहे जा रही थी – ‘देखना सब तुम्हारे पसंद का है – फिर शाम तक चले जाना मेरे भाई|’

‘ठीक है अप्पी कल तक रुक जाऊंगा – कल ही है न सगाई?’

अप्पी झट से मुड़कर उसकी तरफ देखती मानों ख़ुशी से झूम उठी थी|

क्रमशः………………….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!