Kahanikacarvan

हमनवां – 45

हलके सर्द मौसम में जब सब लिहाफ ओढ़े अपने ख्वाबों संग लिपटे सो रहे थे तब समर समय पर बिस्तर छोड़कर रसोई की खिड़की पर अपनी आँखों की खुराक के लिए अपने नियत स्थान पर मौजूद था| चाय के उबलते पानी की रौ में मन कई गुना ऊपर उबल उबल कर सीने की कोटरों से बाहर झांक लेता पर आज वो चितवन नज़रे कहीं नज़र नही आ रही थी| पैन का पानी कम तो दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थी| न कोई संगीत की आवाज़, न कोई चेहरा उसे दिखाई दे रहा था, इसी बेचैनी में समर छत पर चला आया और ऊपर से दृष्टि अवलोकन करने लगा पर अभी भी न आंगन में न खुलते बरामदे में कहीं भी ऋतु उसे नज़र नहीं आई, उस पल उसे लगा जैसे आज का दिन बिन सूरज के उग आया है अब पूरा दिन कैसे कटेगा इसी तन्द्रा में समर खोया था कि एकाएक उसकी दृष्टि ऋतु की रसोई के छोटे से झरोखे तक चली जाती है, जहाँ वह किसी का गिरना देखते ही जितनी रफ़्तार से भाग सकता था उससे भी कही अधिक तेजी से दौड़ता हुआ वह बिन कुछ विचारे ऋतु के घर में प्रवेश कर गया, घर का गेट भी खुला था ये भी उसके लिए हैरत की बात थी, यकीनन कुछ तो बुरा हुआ है| वह अपनी धड़कने संभाले रसोई में पहुंचा तो जो दृश्य उसके सामने था उससे उसकी आंखे हैरत में फटी की फटी रह गई| बुआ जी फर्श पर बेदम पड़ी थी| समर ने तुरंत घर के फोन से एम्बुलेंस को फोन कर बुआ जी को प्राथमिक चिकित्सा देने लगा| अपनी हर संभव कोशिश में उन्हें होश में लाने का प्रयास करने लगा| उनकी धड़कनो की धीमी होती रफ़्तार से घबराहट उसके माथे पर पसीने की बूंदों के रूप में झलक आई|

अगले की पल एम्बुलेंस आई, आवाज़ सुन दोनों भी समर के पास आए और बुआ जी को हॉस्पिटल लेकर भागे| अबतक वर्षा के साथ उसके स्कूल गई ऋतु भी आ गई थी, वे सभी आई सी यु के बाहर अपनी घबराहट के साथ दिल थामे खड़े थे| मानसी ने भी ज्योंही सुना वह भी खुद को आने से न रोक पाई, ऋतु उसके कंधे पर सर रखे तबसे आंसुओं की नदी बहा रही थी| वह उसे हौसला रखने समझाती खुद भी अपनी रुलाई पर किसी तरह से नियन्त्रण रखे थी|

***

गाँव में सभी रिश्तेदार के जाते अब सिर्फ घर के लोगों के बीच थी शैफाली जिससे उनके बीच ज्यादा नजदीकी का उसे मौका मिला| अभी अभी बाहर से आते मोहित देखता है कि शैफाली हैपी को पढ़ा रही थी और उसकी गोद में बैठी गुरमीत को बीच बीच में कुछ समझती जिसे वह अपनी हाथ में पकड़ी कॉपी में पेन्सिल से बना कर उसे दिखाकर खुश हो जाती| कुछ पल तक दूर से वह ये नजारा देखता रहा| हैपी को इतनी देर पढ़ते देखने का उसका ये पहला तजुर्बा था जिससे मन ही मन वह मुस्करा उठा|

फिर उसके पास आने पर ही शैफाली का ध्यान उसकी ओर गया तो उनकी नजरे आपस में मिली तो वे मुस्करा उठी|

“ओए हैपी कि होर रिया है ?” वह हैपी के पास आकर उसकी किताब में देखने लगता है|

“पढ़ रिया हा चाचू – |”

“वाह …|” वह चमत्कृत होता उसकी ओर देखता है पर वह फिर से अपनी किताब के खाली स्थान पर कुछ लिखने लगा|

“तुमने इसको पढ़ा लिया तो समझो बहुत बड़ा काम कर लिया|” अबकि वह शैफाली की ओर देखता हुआ कहता है|

“हाँ ऐसे ही बुक देखी तो सोचा कुछ पढ़ा कर देखती हूँ – |” शैफाली उसकी किताब में देखती हुई कहती है|

“हाँ अच्छा है वर्ना तो ये बैठता कहाँ है – तुम्हारी बात सुन ली इसने !!!” वह कुछ ज्यादा ही मुस्करा कर शैफाली की ओर देख रहा था तो हैपी धीरे से मोहित का कन्धा पकड़कर अपनी ओर झुकाते हुए उसके कान में फुसफुसाता हुआ कहता है –

“चाचू बड़ा अच्छा पढ़ादी है तुसी शादी कार लो फिर पढ़ाने का पैसा वी न देना पडेगा|”

“हट्ट पाजी |” कहकर मोहित उससे छिटकता एक बार शैफाली की ओर छुपी नज़र देख मुस्कराया जो इशारे में ‘क्या हुआ’ पूछती अब उन्ही की ओर देख रही थी|

“कुछ नही बहुत शैतान है|” कहकर वह गुरमीत की ओर बांह फैला देता है तो वह झट से अपनी कॉपी पेंसिल पकडे उसकी गोद में बैठ जाती है|

वह ध्यान से उसकी कॉपी में खिंची लकीरों को देखता हुआ कहता है – “वाह ये सब तुमने बनाया – शैफाली तुम अपनी बात कैसे समझा लेती हो गुरमीते को !!!” वह आश्चर्य से अब शैफाली की ओर देखता है|

“असल में मैंने अपनी दोस्त केनी के साथ साईन लैंग्वेज का कोर्स किया था पर कभी नहीं सोचा था कि इसे मैं कभी अप्लाई भी कर पाऊँगी – यहाँ आकर तो जैसे मैं खुद से ही मिल ली|”

एक अजब ख़ुशी सच में शैफाली के चेहरे पर नज़र आ रही थी|

“ऐसे ही तुम्हें अपने जीवन का लक्ष्य भी मिल जाएगा फिर अपना जीवन तुम्हें सबसे मूल्यवान लगेगा|”

वह मोहित की ओर अनजाने भाव से देखती रही|

“जिंदगी हमे एक बार जरुर खुद को जानने का मौका देती है बस हमे उस मौके को समझना होता है – इसलिए कभी किसी का जीवन बेमकसद नही होता शैफाली |”

वे ऑंखें आपस में मिल कर और विश्वास से भर उठी|

***

आखिर शाम होते होते सभी स्थितियां नियंत्रण में आई और जब बुआ जी ने आंख खोली तो जैसे सभी की जान में जान वापिस आई| आई सी यु से बाहर अब रूम में उन्हें शिफ्ट किया गया तो वह आराम से उठकर बैठती बारी बारी से सभी को देख रही थी| सामने जय, इरशाद, मानसी, ऋतु और वर्षा सभी उनकी ओर देख रहे थे तो दिव्या उसकी बांह में लगी ब्लडप्रेशर का पट्टा खोलकर नोट करते समर को बता रही थी| वे नैन भर ये नज़ारा यूँ देख रही थी मानों काल के मुंह से बचकर अपने शेष जीवन में वह चैन की साँस ले रही हो|

उनके चेहरे की बेचैनी पढ़ती आखिर दिव्या कह उठी – “आप बिलकुल ठीक है – यही फायदा होता है डॉक्टर के पड़ोस में रहने से |” वह मुस्कराती हुई अब समर की ओर देखती हुई कह रही थी – “अगर समय पर डॉक्टर समर आपको प्राथमिक उपचार नही देते तो स्थिति खतरनाक हो सकती थी पर अब तो आप बिलकुल ठीक है|” कहते कहते वह विश्वास से उनका कन्धा पकड़ लेती है|

वे अब नई दृष्टि से समर की ओर देखती है जो संकोच से अब उनकी तरफ न देखते हुए उनकी रिपोर्ट पर अपना ध्यान लगाए था|

बुआ जी अब वाकई अच्छा महसूस कर रही थी, इसलिए उठकर बैठने का प्रयास करने लगी तो सभी आगे बढ़कर उनकी उठने में सहायता करने लगे| वर्षा तो बुआ के गले लग कर सिसक ही पड़ी, बुआ जी सही से पीठ टिकाकर प्यार से उसका सर सहलाती हुई धीरे से कहती है – “मैं अब बिलकुल ठीक हूँ – चिंता न कर मोडी|” ऋतु और मानसी भी उनके पास आकर बैठ जाती है, उनके बीच ऐसा प्यार देख दिव्या समर के पास आकर धीरे से कहती है –

“बड़ा अच्छा नेबरहुड है तुम्हारा |” इसपर समर बस धीरे से मुस्करा देता है|

***

वक़्त खुद ब खुद गुजरे वक़्त को मरहम लगा देता है ऐसे ही बुआ जी समर की देखरेख से अपना सारा पुराना गिला शिकवा भुलाकर पूरे सानिध्य से उसकी बात मान रही थी इसका नतीजा ये हुआ कि जल्दी ही ठीक होती दूसरें दिन ही उन्हें हॉस्पिटल से डिस्चार्ज मिल गया, क्योंकि घर पर वे समर के निरिक्षण में रह सकती थी| बुआ जी करवट लेती लेटी थी उनकी पीठ की तरफ बैठी ऋतु समर की बात ध्यान से सुनती उसे देख रही थी, वह दवाई देने का निर्देश समझाते उनकी रिपोर्ट का सारा पेपर खुद सँभालते हुए अब ऋतु की गौर से अपनी ओर टिकी आँखें को देखता जैसे खुद में ही ठहर गया था| बहते वक़्त की रफ़्तार भी हौले हौले बीत रही थी| उन मिलती आँखों में गज़ब की चाहत थी जो बिन स्पर्श के भी एक दूसरे से जुडी थी किसी अदृश्य बंधन से| उनका एक दूसरे के आस पास मौजूद होना ही उनका सबसे बड़ा सुख था| एक दूसरें में खो जाने की अनुभूति ही उनके लिए अपूर्व सुख की इतिश्री थी| लेकिन वक़्त कहीं थामे से थमता है, तभी उस कमरे से प्रवेश करती मानसी की नज़र झट से उन आँखों की चोरी पकड़कर मुंह दबा कर हंस पड़ती है| उसके पीछे जय भी आता अब भौंह उचकाकर समर की ओर देखता धीरे से मुस्करा देता है| अब आहट पर बुआ जी उनकी तरफ करवट बदलकर उनकी तरफ देखती है|

मानसी झटसे बुआ जी के पास आती उनका माथा सहलाती हुई पूछ रही थी – “अब कैसी है तबियत आपकी ?”

“अच्छा लग रहा है – तुम सब को साथ देख मन यूँही खुश हो गया|” वे अपनी एक घूमती दृष्टि से उन चारों को देख डालती है|

“तो घर चलने की तैयारी करिए बुआ जी – आज आपको डिस्चार्ज मिल रहा है |” मानसी उनको अपने हाथ का सहारा देती बैठने में मदद करती है|

जय को ड्रेस में देख समर उससे कहता है  -“इरशाद कहाँ है – वह कार से छोड़ आएगा क्योंकि मेरी तो ड्यूटी है अभी|”

“हाँ अभी आ रहा है |” तभी इरशाद कमरे ने आता बुआ जी के पास आता उनका हाल चाल लेने लगता है| बुआ जी भी यूँ खुश थी मानों अपने परिवार के बीच सानिध्य में जो सुकून मिलता है|

तभी वहां डिस्चार्ज पेपर के साथ डॉक्टर दिव्या आती वहां मौजूद सभी को एक दृष्टि से देखती मुस्कराती हुई आँखों से हेलो कर अब समर को पेपर दे रही थी|

समर उनके पास आता एक आखिरी बार फिर उनका ब्लडप्रेशर लेने लगता है| बुआ जी पहली बार समर की मौजूदगी से हर्षित होती उसकी ओर देखती पूछने लगती है – “समर बेटा एक बात पूछूँ ?”

समर पम्प में हवा भरते भरते औचक उनकी ओर देखता है|

“मैं तो घर के अन्दर रसोई में थी तो तुमने कैसे जान लिया कि मैं गिर गई !!!”

बुआ जी जिस सहजता से प्रश्न कर समर की ओर देखने लगी पर वहां मौजूद हर शख्स पर अलग ही प्रतिक्रिया हुई| समर जहाँ बगले झाँकने लगा तो जय, मानसी और इरशाद अपनी हंसी पर न काबू कर पाने से चुपचाप बाहर की ओर खिसक लिए तो दिव्या हैरत से सारी प्रतिक्रिया देखने लगी|

स्थिति संभालती ऋतु झट से आगे आती बुआ जी से कहने लगी – “अभी कोई दवा देनी है बुआ जी को !!”’

समर चुपचाप एक दवा उसकी हथेली के बीच रखता बाहर निकल जाता है| दरवाजे के बाहर आते अब उसकी नज़र दीवार का टेक लिए बेतहाशा अट्टहास करते जय, मानसी और इरशाद पर जाती है जो समर की हालत पर अपनी हंसी पर काबू नहीं रख पा रहे थे| समर भी मुस्कराता अपने सर पर हाथ फिराता चुपचाप उनकी नज़रों के सामने से निकल जाता है|

……..क्रमशः

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