Kahanikacarvan

हमनवां – 55

इरशाद देखता है कि घर आकर इधर उधर दो चार कॉल करके समय बिताते जय फिर थाने जाने के लिए तैयार हो जाता है|

“ये क्या – इतनी जल्दी फिर !!”

जय वर्दी पहनता सीने के बटन लगाते लगते अपनी उंगली में फंसी सिगरेट अब होंठों के बीच दबाता हुआ एक बारगी उसकी ओर देखता है फिर पूरी तरह तैयार होते होते कहने लगता है – “कहा न – बहुत जरुरी केस है और इसे जब तक सुलझा नही लूँगा चैन से नही बैठ पाउँगा|”

इरशाद अवाक् उसकी ओर देखता रहा और जय एक सिगरेट खत्म कर अब दूसरी सिगरेट सुलगाते हुए आगे कहता है – “तुझे समय मिले तो मानसी से मिल आना |”

“मैं अकेला नही जा रहा |”

“तू चला जा न यार – दोस्त है तू उसका – देख आ न कैसी है वो ?”

“और तुम्हारी हालत !!”

“मेरी हालत तो उस दिन सुधरेगी जिस दिन ये केस सुलझेगा – मानसी से बहुत बड़ी गलती हो गई है – मैं जिस केस में लगा था उसमे अनजाने ही मानसी का नाम भी आ गया है|”

बेचैन नज़रों से जय कहता है तो ये सुन इरशाद झट उसके सामने आता हुआ कहता है – “मानसी का !!!”

अपनी बात समझाने जय इरशाद के ठीक सामने बैठते हुआ कहता है – “तुझे पता है मानसी क्राइम रिपोटिंग कर रही थी ?”

“नहीं मुझे नही पता |”

“तो करता क्या है तू – सारा दिन उसके साथ रहता है और तुझे पता ही नही कि वो किसी शैली के साथ भी काम कर रही थी|”

“शैली !!! यार अगर ये सच है तो वो सच में कोई मुश्किल में होगी|” इरशाद परेशान हो उठा था|

“मुश्किल तो उसने अपने लिए खुद खड़ी की है – उसे जो कॉल आते थे उसमे एक कॉल उस व्यक्ति के नंबर की भी है जिसकी हत्या हो चुकी है और जब ये केस खुलेगा तो उसके नंबर के साथ उसका नाम भी आएगा|”

इरशाद ऑंखें फाड़े सब सुन रहा था|

“चार अनजान लोगो का बारी बारी से क़त्ल होता है और जब उनके बारे में पुलिस खंगालती है तो पता चलता है वो चारों कई साल पहले नामी अंडरवर्ल्ड के लोग थे, जिन्हें एक ही वक़्त बुलाकर जानकर यहाँ खत्म किया गया – उनके बारे में किसी ने कोई दावा नही किया तो पुलिस ने इसे सीक्रेट केस में डाल दिया जिसकी तहकीकात मैं कर रहा था और इसी चौथे व्यक्ति से मानसी का संपर्क सूत्र मिला है – यही मेरी परेशानी का सबब है |”

“क्या ये सच है ?”

“हाँ – अभी वैसे भी उनके बारे में कोई फाइल रिकॉर्ड नही मिला है – जिस दिन मिल गया समझो उन्हें अपराधी साबित करते केस सोल्व हो जाएगा – अब बस मानसी को इस पचड़े से कैसे भी निकालना है |” कहते कहते जय अब अगली सिरगेट जलाने लगता है ये देख इरशाद झट से उसके मुंह से सिगरेट छीनता हुआ कहता है – “ये क्या है यार तबसे देख रहा हूँ – लगातार पी रहे हो |”

जय उसके फेकने से पहले ही सिगरेट उससे लेता हुआ कहता है – “यार कुछ तो सहारा दे जीने का |” उसके कंधे पर हाथ रखता उसे आश्वस्त कर सिगरेट होंठों में दबाएँ दबाएँ वह तेजी से बाहर निकल जाता है, इरशाद हैरान बैठा अगले क्षण बुलेट की आवाज सुन बाहर की ओर तेजी से जाता है पर तब तक जय निकल चुका था|

***

ये सर्दियों की खुशनुमा सुबह थी जिसमे धूप के आगमन से जैसे सारा जग ही सड़क पर निकल आया था, लोगों की भीड़ चारोंओर नज़र आ रही थी| कितना कुछ कहते सुनते लोगों के मुंह ही नही थक रहे थे उनमें वे बिन शब्दों के अपनी घूमती निगाह से एक बार एक दूसरे की ओर देख लेते और जानकर अपने चेहरे के भाव और कठोर कर लेते| ड्राइविंग सीट पर मोहित तो बगल में शैफाली ख़ामोशी से बैठी थी| उनके बस लब ही खामोश थे वे बिन शब्दों के एक दूसरें से बातें कर रहे थे, जिसे सिर्फ वे नादान दिल ही सुन और समझ सकते थे| रिंग रोड से यमुना एक्सप्रेसवे तक आने से पहले वाली आखिरी क्रासिंग में ज्यों ही कार रूकती है एक महिला फूल की लड़ी लेकर उसकी खिड़की तक दौड़ आती है| ये खुशबू पारिजात की थी…शैफाली उन फूलों की खुशबू को कभी नही भूल सकती….वह उन्हें देख ही रही थी कि मोहित उन्हें लेलेता है और उसकी हथेली में देते अपनी आँखों से ही जैसे पूछता है क्या इन फूलों की तरह ही कुछ समय के लिए वह आई थी…प्रश्न निरुत्तर छोड़ कार फिर अपने रास्ते की ओर आगे बढ़ जाती है….शैफाली उन फूलों को अपनी हथेली में लिए अपनी सांसों से अंतरस खींचती ऑंखें बंद कर उनमें खो जाती है…ये पल मोहित की निगाह एक बार फिर दूर से ही जी भर के देख सदा के लिए अपनी आँखों में कैद का लेती है….फिर रास्ता चलते हवाएं खुशबू संग उनके चारोंओर पसर जाती है….

तीन घंटे का रास्ता कब लबों की नीरवता में कट गया, वे समझ ही नही पाए ज्योंही ताजमहल की पार्किंग में कार रुकी जैसे वे अपने अपने ख्यालों से बाहर आ गए और अनिमेष एक दूसरें की ओर देखते रहे…ये लम्हा बड़ी तेजी से वक़्त की हथेली से सरकता जा रहा था…कितना कुछ कहने का बवंडर धड़कनों को चैन नही लेने दे रहा था फिर भी आखिर क्यों लब खामोश है…न कोई शिकायत न उलाहना बस निर्मम वक़्त से कुछ और मोहलत का निवेदन था उन आँखों में…

मोहित अपनी ओर से उतरकर शैफाली की ओर देखता है जो सीट बेल्ट में उलझे अपने पल्ले को निकालने में परेशान थी, उस एक पल यादें कुछ कदम पीछे चल दी और मोहित उसके पास पहुँचता धीरे से उस उलझन से उसका पल्ला छुड़ाकर एक बार फिर उसका चेहरा गौर से देखता है…ढेर आग्रह…थोड़ी जिद्द…तो थोड़ा अक्खड़पन था उनमें…उसकी ऑंखें मुस्करा दी….और फिर वे उसी ख़ामोशी से साथ साथ चल दिए….

रास्ते, दुकाने, लोगों की भीड़ कितना कुछ था उनके आस पास जिससे बेखबर वे बस साथ में आगे बढ़ते रहे…शैफाली के लिए साड़ी पहनकर तेज कदम उठाना उस पल दुश्कर था…वह अपने छोटे छोटे क़दमों से रास्ता चल रही थी..वह देखती है…उससे कहीं ज्यादा महसूसती है कि हमेशा की तरह उससे तेज कदम चलने वाले मोहित के कदम आज उसके क़दमों के हमकदम हो गए थे….वे कदम आज उसके साथ साथ चल रहे थे पर बेहद ख़ामोशी से….दूर से ही ताज खुले दिल से दिल वालों का स्वागत कर रहा था…उस पल को आँखों में कैद करने तो आई थी शैफाली पर जाने कहाँ डगमगा रही थी उसकी निगाह…वह देख तो सामने रही थी पर साथ साथ चलते मोहित का हर कदम जैसे उसकी धड़कनों से कदमताल कर रहा था…

विश्व के सांतवे अजूबे को देखने लोगों की भीड़ उमड़ी थी तो उन टूरिस्टों को सूंघते कई गाइड इधर उधर फैले थे, उन्हीं में से कोई एक जोड़ी आंख उन्हें अन्यत्र भटकते जैसे भांप लेती है और लगभग दौड़ती हुई उनके पास आते कह उठी – “गुड इवनिंग सर – आपको रात की बुकिंग लेनी है ?”

मोहित चौंककर उसकी तरफ देखता है, वह अभी भी कहे जा रहा था|

“सर आज पूरे चाँद की रात है मतलब कि पूर्णिमा की रात जब चांदनी रात में ताज के दीदार के लिए लोग दूर दूरसे यहाँ बुकिंग करा कर आते है पर सर आप चाहे तो मैं आज ही आपको चांदनी रात में ताज का दीदार करा सकता हूँ – |”

मोहित रूककर अभी भी हैरान उसकी तरफ देखता रहा जिससे गाइड कुछ समझते वह फिर जल्दी से कहता है – “सर मैं बिलकुल वाजिब रेट में ही टिकट दूंगा बस आप गाइड का जो चाहे दे देना – देखिए यहाँ आकर किसी को टिकट नही मिलता लोग नेट से बुकिंग करा कर ही यहाँ आते है –– अब हम पहले से ऐसे टिकट का इंतजाम रखते है – देखिए इससे आप जैसे टूरिस्टों का काम भी आसन हो जाता है और हमारा भी खर्चा पानी हो जाता है – सर ज्यादा सोचिए मत – सच में अगर आज आपने चांदनी रात में ताज का दीदार कर लिया तो याद रखिएगा आप उस पल को जीवनभर भुला नही पाएँगे – इतना खुबसूरत होता है ये नज़ारा |” अपना आग्रह वह कर चुका था अब रूककर मोहित की ओर अपनी बात की सहमति के लिए देखता रहा|

“नही भाई – हमे नही चाहिए |” कहकर मोहित आगे बढ़ने लगता है|

“अरे सर सुनिए तो – मैं कुछ भी एक्स्ट्रा चार्ज नही लूँगा जो वाजिब लगे दे दीजिएगा सर|”

मोहित रूककर उसकी तरफ देखता है – “भाई समय की समस्या है – कल इनकी फ्लाईट भी है |” अबकी जानकर वह शैफाली की ओर देखता हुआ कहता है जिससे उसके चेहरे पर कुछ बदल जाता है और वह जल्दी से कहती है – “कल ग्यारह बज की फ्लाईट है |”

शैफाली की बात सुन अब गाइड की रूचि उसकी ओर मुड़ जाती है जिससे वह झट से पूरे उत्साह से उसकी तरफ देखता हुआ कहता है – “कोई दिक्कत नही – शाम सात से रात बारह तक का ही विजिटिंग आवर होता है – आप घूमकर आराम से वापस भी आ सकते है |” फिर कुछ ध्यान आते अपनी बात की साथर्कता के लिए वह पूछता है – “आप कहाँ से आए है ??

“दिल्ली |”

“अरे सर फिर तो कोई दिक्कत ही नहीं है – तीन घंटे का रास्ता है और गाड़ी वाड़ी सब मैं व्यवस्था करा दूंगा – उसकी आप कोई चिंता ही मत करिएगा|”

“हम अपनी गाड़ी से आए है |” मोहित जल्दी से कहता है|

“तो भी सर कोई बात नही है – ये तो बहुत अच्छा है आप आराम से रात में ही वापस जा सकते है और दिल्ली आगरा रूट तो कभी भी खाली नही रहता|” वह भी उन्हें किसी तरह से छोड़ने को तैयार नही था| आखिर दोनों की सहमति का भाव उसे उत्साह से भर जाता है|

वे दो दिल भी कहाँ कहीं जाना चाहते थे लेकिन अपने रुकने के फैसला का ठीकरा गाइड की जिद्द पर फोड़ खुश हो जाते है|

“सर अभी आप लोग यहाँ घूम लीजिए फिर आगरा शहर जरुर घूमिएगा – उसके बाद आप लोग राधास्वामी मंदिर चले जाईएगा – बहुत खूबसूरत है – 112 साल लग गए उसे बनने में – फिर आपको जो खरीददारी करनी हो वो करके शाम को मैं आपको फोन करूँगा – तब तक मैं आपकी बुकिंग कन्फर्म करके रखूँगा |”

गाइड के बहुत ज्यादा बोलने से अब दोनों के चेहरे पर उकताहट आने लगी थी, पर शायद ऐसे चेहरे देखना उसका रोज का काम था इसलिए वह उतनी ही फैली मुस्कान के साथ सब कहता रहा फिर मोहित से उसका नंबर लेने लगता है इससे उब कर शैफाली किसी बैंच में बैठ जाती है| उसे बुकिंग अमाउंट देकर मोहित नज़र घुमाकर शैफाली को खोजता अब उसकी तरफ आता है| उसे बैठा देख मोहित भी वही बैठा जाता है, विपरीत दिशा में बैठे वे एक दूसरे को देखने लगे कि तभी एक चमक से उसकी आंख कौंध जाती है|

“क्या पोज़ आया है बहुत खूबसूरत – डायना बैंच पर आसीन एक खूबसूरत जोड़ा |”

एक व्यक्ति अपनी भरपूर मुस्कान के साथ मोहित के सामने खड़ा अपना कैमरा दिखा रहा था जिससे अभी अभी उसने उन दोनों की एक तस्वीर उतारी थी|

“आप देखिए तो – बहुत खूबसूरत तस्वीर आई है – हमेशा ताज की याद जैसी ताज़ा रहेगी आपके साथ – बस दो सौ की|” वह झुक कर कैमरे का स्क्रीन मोहित की आँखों के सामने करता है, शैफाली भी कैमरे में तस्वीर देखती है तो पाती है कि तस्वीर में वे कितने नज़दीक दिख रहे थे…वह देखती रह जाती है|

“ले भाई तू भी ले|” मोहित पॉकेट से नोट निकालकर उसे देता है, शैफाली अनिमिख देखती रह गई…क्या ये तस्वीर मोहित के लिए अतिरिक्त भार की तरह है..!!! उसने तस्वीर की ओर से मुंह मोड़ लिया| अब वह अपने से कुछ दूर किसी वृद्ध जोड़े को बरबस देखे जा रही थी, वे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे आहिस्ते आहिस्ते भीड़ से गुज़रते किसी जगह रुक जाते है, वृद्ध व्यक्ति वृद्ध महिला को अपना हाथ किसी खास एंगल में रखे रहने का इशारा कर रहा था, और उसके सामने नीचे की ओर बैठकर वे जाने कौन का पोज़ बनाकर तस्वीर खींचकर खुलकर हंस पड़ा था| वह वृद्ध इशारे से बता रहा था कि ताज आज से उसकी उंगली में टिका रहेगा, ये सुन वृद्धा की झुरियां खिलखिला पड़ती है|

“शैफाली….शैफाली..!!”

“हाँ…!!!” वह चौंककर मोहित की ओर देखती है|

“चले !!” वह जाने के लिए पूछ रहा था, इससे वह चुपचाप उठकर चलती मोहित के हाथ में वह तस्वीर देख अब धीरे से मुस्करा देती है|

पार्किंग से कार लेकर मोहित रास्ता पूछता पूछता राधास्वामी मंदिर तक जाता है, वहां कार पार्क कर वे साथ में मंदिर में प्रवेश करते है| मंदिर में समाते जैसे उनके अन्दर कोई सुकून सा प्रज्वलित हो उठता है उनके मन में| वे साथ साथ चलते उस प्रांगण में समाते चले जाते है, जहाँ मंत्रो की प्रतिध्वनि उस कलात्मक अद्भुत मंदिर के पोर पोर से टकराती मानों वहां आते हर श्रद्धालुओं के क्लांत मन को गतिशील कर देने की समर्थ रखती थी| वे कदम साथ साथ दर्शन कर अब बाहर को वापस आ जाते है| आगरा का राधा स्वामी मंदिर पत्थरों पर काम पेंटिंग की तरह लगता है|

“बहुत खूबसूरत मंदिर है अगर यहाँ नही आती तो कुछ छूट जाता|”

“हाँ सच में छूट जाता |” मोहित शैफाली की बात का जवाब देता दो पल को उसकी ओर देखता रहा और सोचता रहा कि कितना कुछ छोड़कर तो जा रही हो…पर शब्दों से कह न सका|

“राधे कृष्ण राधे कृष्ण |”

आवाज सुन दोनों आवाज़ की दिशा की ओर एक साथ देखते है, उनके सामने गेरुआ साड़ी में एक कमर झुकाए हाथ में कमंडल लिए एक वृद्धा अपनी आशा पूर्ण आँखों से उन्हें देख रही थी|

जब तक वे कुछ समझते वह अपने कमंडल के किनारे लगे टीके से टीका लेकर मोहित के माथे की ओर अपना हाथ बढ़ा देती है पर उसके कद तक पहुँचते की असमर्थता देख मोहित उसकी ओर झुक जाता है|

“राधे कृष्ण तुमदोनों पर कृपा बनाए रखे |” कहती हुई शैफाली की ओर देखने लगती है जो खुद हतप्रभ उनकी ओर देखे जा रही थी|

“ये आज कल की लड़कियां कोई सुहाग का चिन्ह नही लगाती – जाने कैसा है ये जमाना|” वे लगातार बोलती हुई मोहित के हाथ में टीका देकर उसे शैफाली के माथे पर लगाने का निर्देश देती है, मोहित सकपका जाता है वह कुछ कहना चाहता था पर लगातार बोलती माई उसकी कुछ नहीं सुनती|

“लगाओ मांग में – अरे नहीं सिखाओगे तो कैसे सीखेगी – कल को बच्चे होंगे तो उन्हें क्या सिखाएगी – ये आजकल की लड़कियां भी न – हम तो सुहागन होने पर कितना सजे संवरे रहते थे |”

मोहित का इंकार कमजोर था या माई का हुक्म मजबूत वह टीका शैफाली के माथे के ऊपर लगा देता है और शैफाली किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी रह जाती है|

“बेटा कुछ खाने के लिए दस बीस दे दो |” वह लाचारी में अब उनके सामने अपना हाथ पसारती है, मोहित झट से बिन देखे कुछ नोट निकालकर उनके कमंडल में डाल देता है|

“जुग जुग जियो बेटा – अब तो मांग मांग कर ये बुढ़ापा कटे किसी तरह वरना अपनी औलाद तो अब पहचानती भी नहीं – कृपा करो राधा कृष्ण |” वे बडबडाती हुई उनकी पहुँच से दूर होती रहती और वे दोनों वही खड़े बस देखते रह जाते है|

मोहित अब शैफाली की मांग की ओर देखता रहा…उसका जी हुआ कि फिर एक बार और छू ले उसे और अपनी पनाह में सदा के लिए ठहर जाने दे ये लम्हा…..उसका अधिकार और पुष्ट होता रहा…..वह धीरे से मुस्करा दिया|

“चलो |”

वह कहता है और शैफाली साथ चल देती है, न वह पूछती है कहाँ न मोहित जताता है कहाँ|

“रात को थोड़ी ठण्ड हो जाएगी – चलो यहाँ से तुम्हारे लिए कुछ लेते है|” अब वे किसी कपड़ों की दुकान के बाहर थे| किसी अधिकार सा वह कहता हुआ साथ में अन्दर आ जाते है, मोहित का मन मयूर हो उठा था…उस पल अपने धड़कते दिल को वो समझाता है कि अब किसी उपयुक्त लम्हे में अपने दिल की सारी बेचैनी उसके सामने रख देगा…फिर चाहे वो जो समझे..!!

सेल्सगर्ल उस जोड़े को आता देख झट से उनका स्वागत करती अपनी बातो की झड़ी लगा देती है|

“आइए आइए मैम सर क्या दिखाए शाल !!! – एक से बढ़कर एक है – पश्मीना शाल भी है….एकदम पहली ऊन से तैयार….सीधा कश्मीर से आता है हमारे यहाँ…ये देखिए आपकी चिकेन की साड़ी संग क्या खूब खिलेगा ये ट्यूलिप के फूलों वाला शाल….सर आप ये जैकेट एक बार पहनकर तो देखिए आप लेने से इनकार नही कर पाएँगे..|” उनके सामान बेचने की कला पर शैफाली को हंसी आ गई|

जब शैफाली ने शाल और मोहित से जैकेट लेलिया तो दूसरा सेल्समेन बोल उठा – “सर और कुछ दिखाए – चादर – कम्बंल – अकसर नए जोड़े हमारी दुकान से लेकर जाते है|”

वे दोनों अचकचा जाते है और इंकार का आखिरी वाक्य बोल साथ में बाहर आ जाते है|

कुछ पल तक कोई अनचाहा मौन उनके बीच पसरा रहता है तब तक जब तक वे किसी रेस्टोरेंट में नही आ जाते| मीनू कार्ड पर नजर दौड़ाते मोहित को ख्याल आता है कि आज तक उसने कभी शैफाली की पसंद तो पूछी ही नही…वह मीनू कार्ड उसकी तरफ करता हुआ कहता है – “आज तुम ऑर्डर करो |”

वह एक सरसरी निगाह से कार्ड के सभी हिस्से को देख डालती है और वेटर के आते पंजाबी खाने का ऑर्डर देरही थी, मोहित अवाक् उसे देखता मंद मंद मुस्करा दिया…ये देख शैफाली आँखों से सवाल करती है – “क्या कुछ कहना है ?”

वेटर रूककर अब उन दोनों को देखने लगता है| मोहित धीरे से न में सर हिला कर मुस्करा कर टेबल के फूलदान पर अपनी नज़र गड़ा देता है|

वेटर चला जाता है पर शैफाली उन गहरी मुस्कान से नज़र नही हटा पाती मानों उसका दिल मन ही मन उससे पूछ रहा था तो वो क्यों नही कहते जो सुनना चाहता है दिल….!!

अब मोहित उसकी ओर नज़र उठाकर देखता है तो शैफाली जानकर अन्यत्र देखने लगती है|

इसी बीच खाना उनके बीच सज जाता है, वे खाना शुरू करते है| मोहित कनखियों से शैफाली को देख रहा था जिससे उसका मन एक शरारत करने को मचल उठा और दो गिलास पानी उसकी ओर सरका कर होठों के किनारों से मुस्करा देता है जिसे समझती शैफाली के होठों के किनारे तंग हो उठते है| वह गिलास उसकी तरफ सरका कर जबरन एक तीखा कौर जल्दी से अपने मुंह में डाल लेती है जिससे उसके अगले ही पल उसके मुंह से एक आह सी निकल जाती है|

ये देख मोहित फिर से गिलास उसकी तरफ बढ़ा ही रहा होता कि वह झट से उससे लेती एक ही घूंट में उसे गले से नीचे उतार किसी निरीह मृग की तरह उसकी ओर देखने लगती है जिससे मोहित अपनी हँसी नही रोक पाता इससे शैफाली नाराजगी में अपने होठों सिकोड़ लेती है| 

तभी उसी वक़्त गाइड का फोन आ जाता है..

क्रमशः…..

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